एक समय में एक विषयक तेरा मन है।
मित्रों, हमारे ज्यादातर दुख, आने वाले समय की दुष्कल्पना के भय मात्र होते हैं। अतः सोच को वर्तमान में रखना, और हमेशा पॉजिटिव रहना ही इनसे बचने का मार्ग है। आज इसी पर कुछ लाइने पढ़े और आनंद लें।
उसने पूछा, दुख कहां है?
मैने सोचा, और ढूंढा...
जद्दोजहद.. है,
जिस... जगह...
अ..व्यवस्था.. फैली हुई है,
जगह, जो... भी,
शांति... से, महरूम.... है
प्रिय! दुख वहीं है, दुख वहीं है।
और सोचा! थोड़ा... आगे,
दुख.. वहां, बाहर
नहीं... है,
बहुत कम है, बाह्य यह
यह आंतरिक है.
अंतरों में छुपा.. है,
हम सभी के,
मात्र यह!
मन.. का विषय है।
क्या कहूं!
क्यों खिन्न है, वह..!
दुखी.. है!
टंग.. गया है, खूंटियां.. पर!
सोच.. की, किसी..
विचारों पर रुक गया है,
अन्यथा कोई चाह है,
बाकी अभी,
अंदर कहीं,
लंगूर
सा लटका हुआ है, पकड़ कर!
उतरता.., नीचे नहीं.. है, छोड़कर!
क्या कहूं, हे मित्र!
मेरे...
चार... दिन से
चुप.. है बैठा, चौकियों... पर!
चार पाए, दुख में बांधे साथ अपने
पांव रखता.. भूमि पर
बिल्कुल... नहीं है।
छोड़ दे रट...!
ढील... दे दे!
विचारों.. को, मात्र.. बस!
वह... सोचना
बस शुरू कर दे, पॉजिटिव!
कोई वाकिया..
मधुमक्खियों के, शहद... सा,
बस स्मृति में,
कल्पना में, ध्यान कर ले
नाथ का, विश्वास जी ले
तात्क्षणिक दुख मुक्ति है ये,
दुख मुक्ति है ये!
एक राज... है,
तुमको.. बताऊं! सत्य.. है यह
एक समय में एक विषयक
तेरा मन है।
दो विषय, दो नाव पर यात्रा करे
संभव नहीं हैं।
जय प्रकाश मिश्र
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