पहरुआ... बैठा रहा, नाकों.. पे, हर..

मित्रों, बहुत कुछ हम अपने लिए करते हैं और उससे ज्यादा नियति, समष्टि भी सभी के लिए करती रहती है। मन में आंतरिक शांति होनी चाहिए, जीवन एक रहस्य है और चलता ही है। इसी पर कुछ लाइने पढ़ आनंद लें।

पहरुआ... बैठा रहा, 
नाकों.. पे, हर..
जिंदगी को! 
रोक दे! 
पर, 
संभव नहीं था,
उसे... मालूम, न!  था,,
जिंदगी! बाहर.. नहीं..  
भीतर.. कहीं 
थी,
पनपती,.. 
अंतर्मनों मनों में, 
सज़ रही 
रस.. रही, और रिस रही।

आग?   
हां... 
आग!  जब.. 
चहुंओर.. थी, घेरे इसे! 
पसीना बन निकलती.. यह
निःस्वांस.. बन बन.., 
सुलगती  
अंधेरों 
में, 
अतल उन गहराइयों में
सजग 
हो, 
अरुण को बस जोहती थी, 
अरुण को बस जोहती थी।

उस..
ताप.. में, 
जब, जल.. रहा...
पर.., परिंदों... 
का,
ये, जिंदगी थी, 
बेखबर हो, ताप से 
संताप से, संयम.. किए,  
स्वप्न! कल के, आप संग ही 
बुन रही 
थी।
पहरूआ बैठा रहा...
इसे.. रोक दे,
शिव.. सी 
लगाती, भस्म!  
यह, शांति से, चुप.. खड़ी थी।

तूफान घेरे थे इसे..
अब डुबा दें,
वे, चाहते 
थे,
पर
समय है,
परेशाँ बिल्कुल न हो,
यह जानती थी,
चांद तारे
नक्षत्र
सारे
स्थिर नहीं, गतिमान हैं
अरे! ये ही, बदलते, विचार हैं
संसार सारा, सोच है,
सोच, ग्रह ये
बदलते हैं
जानती
थी
इसलिए, थोड़ा रुकी
तूफान की एक उम्र थी,
ढल गई, 
जिंदगी शान से आगे बढ़ी।

समय है, 
यह बदलता है, 
रुकता नहीं है, किसी का
कुछ, कर सको तो, कर भी लो
समष्टि.. करती, स्वयं भी
सबके.. लिए
शांति मन 
की
जरूरी है, 
संसार से इस निपटने को,
संसार से इस निपटने को।

जय प्रकाश मिश्र

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