जानता हूं, चूर्ण शीशे, की हैं ये..

मित्रों, जीवन सरलता में बीत जाय तो, यह अतिविशिष्ट स्थिति जाने। इससे सुंदर जीवन नहीं, लेकिन कभी कभी, कोई चिंता, कोई सोच, कोई इच्छा, इतनी प्रबल हो जाती है जीवन पर ग्रहण लग जाता है, नुकीले चंगुल में प्राणी फंस जाता है, निकल ही नहीं पाता। आज की लाइने इसी पर। अच्छा लगे तो पूरा पढ़ें अन्यथा छोड़ दें।

इच्छाएं..... हों
चिंताएं... हों, 
सोच.. हो 
कोई.!  
बहुत.. गहरी.! 

कांटा फंसा हो, 
गले में, 
सिंघी.. 
मछलियों का, अरे..भी! 

तब भी वहां, एक
मार्ग.. है, 
प्रिय! निकलने का, 
मान तो
थोड़ा रुको! 
बात! तुम, एक बार 
सुन लो...।

समस्या! कैसी... भी, हो, 
कितनी.. प्रबल... हो, 
हो... बलवती...! 
आग.. बन! हो तप्त करती!  
अंतस्थल जलातीं!  
धधकती..। 
गुलउरि के जैसी, गांव.. की,
चौबीस घंटों, गर्म.. रहती,
लावा सरीखी, आप संग
परिवार को भी, भस्म करतीं।

स्फुलिंग.. हों, 
रह रह, चिंनकती, 
चिन्हिकिती, चिल्हकतीं 
चकमकों सी, एक क्षण में
चमक जातींं, मन हृदय में, 
शूल... सी..।
तब भी.., प्रिये..!  
मार्ग.. है, थोड़ा रुको तो..
बात..! तुम, एक बार सुन तो...।

जानता हूं, चूर्ण शीशे, की हैं ये..  
चुभती गले को, 
बुद्धि, मन को भेदतीं, तीक्ष्ण... होतीं, 
कोर हैं, त्रिशूल की।
पर, मार्ग.. है, प्रिय! थोड़ा 
रुको तो..
बात..! तुम, एक बार, सुन तो...।

चिंताएं हैं ये, बस 'सोच' मन की,
स्थिति हैं, मात्र जग की
बदलती हैं, क्षण
अनुक्षण..
एक 
सी
न! सदा रहतीं, 
इसलिए तूं, उबर! इनसे।

तोड़.. 
सारे बंधनों को, 
जाल को घेरे हैं जो... 
पार कर, इन्हें.. संयमों से, 
रौंद.. इनको, विचारों.. से, विवेक से।

शुद्ध कर, हाथ अपने
पाश सारे, खोल मन के।
विवेक को, मन बुद्धि को, 
मुक्त, कर तो,
साथ अपने, रख तो इनको।

डुबो दे, हर ग़म को तूं!  
बांध इनकी 
पोटली, 
ग़र्क में, दे.. फेंक सबको।

उठा तो, 
पहला कदम..
मार्ग.. है, प्रिय! थोड़ा रुको..
बात..! तुम, एक बार, सुन तो...।

भयंकर हैं? 
विकट-तम..हैं?  
प्रज्ज्वलित, प्रवाल..सम हैं? 
आमादा हैं...ये,  
ये..उतारू हैं 
हर हाल में,  मैं... पूर्ण हूंगी!  

उससे भी ज्यादा, 
तोड़तीं... 
हर 
एक वादा, 
इतनी कमीनी "सोच" है, ये...।

जानता हूं, मानता हूं 
इरादा-ए
मन हैं बनतीं, सीमांत 
तक, 
संभावना के टूटने की धार तक! 

पर जोहतीं हैं, मन तेरा
ध्यान कर,
वे...
चाहतीं हैं, 
छोड़, न.. दें, 
हम, एक क्षण 
उनको... अकेले, 
उनके संग।

संभव नहीं, 
जंग, छेड़तीं हैं, मन के संग।
पर याद रख! यह जगत है, 
सब.. सकल
तूं!  
नहीं, 
अरे! लंवज़ार है सब! 
भावना! है, स्वीकृति! है, 
मात्र तेरी, तूं अलग 
जग, शरीरों से, 
आत्म है।

बंधन शरीरों का 
अरे!  तुझे त्याज्य है..।
नहीं समझे, न! मित्र मेरे..
तो.. 
कथानक, एक, श्रेष्ठ है..
श्री कृष्ण अर्जुन, का ही.. है ।

सोच, चिंता, भावना, इच्छा 
कहीं कुछ नहीं है
संसार पूरा, और तुम! 
मात्र! मति का फेर है! 

गोलोकवासी कृष्ण हों, 
बस उसके ही पहले
जरा के 
उस बाण से, अश्वत्थ नीचे! 
अकेले, चुप पड़े थे
भगवान खुद
देखते...
झाग से, लड़ते झगड़ते, वंश को।

अंत होते, आंख से...
भांड भांडों, मूसलों से मार खाते
काटते एक दूसरे को दांत से
प्रभु, थे, वे...
सन्यस्त थे,  इसलिए 
छोड़ सारी सोच को 
प्रसन्न.. थे, उस स्थिति में।

स्वीकार करते, 
काल के उस 
रक्त रंजित खेल को
डूबते सूरज के संग, 
डूबते निज वंश को।

तुम! 
कौन हो! 
इस स्थिति में
सोच करते, सोच की
सोचो जरा तो...मुक्त हो, 
सब झाग हैं, 
रूप.. ये 
जिंदा लहर यह उठ रही, 
गरजती..
तेज इतनी, एक दिन 
सुनसान तट पर, बिखरने को।

और सुनना चाहते हो, 
तो.. सुनो,
अर्जुन चले, जब द्वारिका से
रानियों को, साथ ले।
 
श्रीकृष्ण 
की, 
तो वीर सैनिक साथ थे,
गांडीव धारी, वीर, अर्जुन!  
रक्षक थे उनके
अनोखे वे वीर वर थे।

पर हार कर, 
कोल, भीलों लुटेरों से,
पराजित हो, दैन्य में चिंतित हुए,
हम तुम, सरीखे..., ठीक ऐसे..
रानियों के भाग्य पर! 
श्री कृष्ण की श्री वल्लभा 
थीं, सभी वे...
इस लिए, दुखी हो,
तुम्हारे से अधिक वे 
सोच में, पड़ गए थे..।

पर क्या हुआ, क्या जानते हो..? 
संसार है यह! 
बदल लेता, मार्ग अपना,
जलों सा, अग्नि सा, 
हवाओं सा
स्वार्थ में, दबाव में, 
स्थिति, 
विशेष.. में
बिन तुम्हारे राय के, भाव के।

रानियां श्री कृष्ण की
श्री स्वरूपा थीं
अनुगत हुईं, 
देख कर, प्राणभय से 
कौन जाने 
स्वार्थ से
साथ ही, उन लुटेरों के
प्रसन्नता से, खुशी से, अथवा दुखी हो
देख अर्जुन शर्म में थे, 
मर रहे,
अकेले...वे
छोड़ सबको, लुटेरों संग 
हस्तिनापुर को गए।

इस लिए 
तो कह रहा हूँ
छोड़ चिंता, छोड़ इच्छा, 
सोच! सारी छोड़ दे,
शांत हो, 
कर्म अपना, कर अकेले, 
शांत हो! 
जग.. जहां है, 
और... जैसे, 
रहने... उसे... दे।

सोच, चिंता, भावना, इच्छा 
कहीं कुछ नहीं है,
संसार पूरा, और तुम! 
मात्र मति का फेर है! 

समीकरण है, 
स्थिति का, समय का
स्थान का, 
हल कभी भी, अरे इसका नहीं रे।
मुक्त हो संन्यासियों सा, 
सारे जग को छोड़ के।

जय प्रकाश मिश्र
 





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