घूमता... हूँ, शहर... तेरे..!

मित्रों, आज आम आदमी को मात्र न्याय की दरकार है, लोग अपनी मेहनत से कमाते खाते हैं। उन्हें अगर मात्र न्यायपूर्ण जीवन मिले तो शिकायतें लगभग समाप्त हो जाएं, इसी पर आज की लाइने।

घूमता... हूँ,
शहर... 
तेरे... 
देख.. कैसे! दर..! बदर..! 
ऐ, सदर! 
ऐ! तख्ते-ताउस-ए-नगर!  
राजधानी.., लखनऊ..!  

तूं...! 
आस.. है,  
सूबे... की इस, 
इतने.. बड़े, इतने... विपुल!
सैलाब जन की,
विश्वास! मन.. की, 
आम जन की 
सांस! है 
तूं! 

तूं ...
माध्यम है, 
जगह.. है, 'वह' 
कष्ट, दुख, तकलीफ अपनी
कह सकें, सब..।

रख सकें, अपनी व्यथा.
पिरते... मनों की..
अरज़, अपनी 
रख सकें,
हम
बिपदा, विपद की।

अधिकारियों से, 
तेरे, हे...!
और वे... 
बिन बिके, कुछ दमडियोंं पर
सत्य को, आधार दें,
निर्णय... करें, 
शीघ्र ही, 
और क्या! हमें चाहिए, 
जनता हैं हम.. 
मांग.. 
करते, सदर ऐ!  
लखनऊ!  
मात्र! तुमसे न्याय.. की बस।

शासन प्रशासन, 
तुम्हारा है 
राज्य
में, 
बस न्याय का रक्षण करो तुम! 
तुम्हारी
मर्यादा यही है।
तुम! एक हो, सबके लिए..।
अमीरों से गरीबों तक
ध्यान रखो, 
अंतर तूं इनमें मत करो।
 
चले आते, न्याय की उम्मीद पाले..
मेरे जैसे, लोग.. कितने..
विश्वास भर कर, 
आंचलों 
में
पास तेरे! 
सोच.. कितनी..  दूर से,
मार्ग.. है, तूं...! 
निदान.. है, तूं...! 
समस्या का, 
हमारी।।।
सत्य का, संधान... कर तूं..! 

तूं! 
पक्ष लेगा, सत्य का.. 
असत्य को, 
तूं दंड.. 
देगा
आखिर कहीं तो, न्याय होगा...!

इसी की उम्मीद है तूं!
अरे! इसी की, 
मंजिल.. 
है.... 
तूं!  
घूमता... हूँ,
शहर... तेरे... दर..! बदर..! 
देख.. कैसे! ऐ, सदर! 
ऐ, तख्ते-ताउस, लखनवू..!  

सत्य को संबल मिलेगा,
न्याय का अंकुर खिलेगा
दर.. पे, तेरे.., आस थी...
एक नया, सूरज दिखेगा।

परेशां...! 
जो, 
आदमी.. है
यही, उसकी.. चाह.. थी।
पर तेरी कीमियागिरी 
को  देख कर
हैरान हूँ! 
राज 
है, 
एक सोचता हूं, कह ही दूं! 
अफसरी का हाल 
जो था, दशकों 
पहले,
आज उससे, भी बुरा है।
सत्य है यह, इसको भी सुन तूं! 

बांग.. दो, 
चक्कर... लगाओ, 
रोज.. आओ...
कान पर जूं रेंगती, 
एक..., है नहीं! 
आतताई, जालसाजों
दुष्ट.. जन का, 
बोल बाला,
उस तरह, है.. आज भी।

चौदह.., 
तेरे, मंडल नहीं, चौदह भुवन हैं, 
लंबे.. चौड़े.., पचहत्तर 
इन जिलों का 
प्रशासन 
तूं! 
देखता है,
पर, एक ही तो रास्ता है! 
उम्मीद!  
हल.... की!
सोच न, तुम पर टिकी है।
 
लोग, हैं, 
मसले हैं, उनके, 
समस्याएं, रोज की, 
क्या क्या कहूं! 
लिफाफा, एक हाथ में है, 
साथ मेरे, समस्या का 
कागजों का, पिटारा है
उम्मीदें बंधी हैं, 
इसी में
पर, 
अब फट! रहा है, 
दम! कम बचा है..।

अफसरों!  
क्या सुन रहे हो..
आदमी हूं! कितना दौड़ूं! 
थक! गया हूँ,
तुम्हारी,
इस प्रणाली से, हार कर
इस व्यवस्था से, टूट कर
रार कर, सकता नहीं 
मैं...
पर याद रखो
कुछ हाथ में मेरे भी है...
इसलिए तो कह रहा हूं...

कोई रास्ता दो,
अरे सांस.. दो, दम घुट रहा है
जीवन नदी है, बहने तो दो!
सत्य का मुंह! बंद है,
स्वर्ण से...
कोई तो देखो! 
अरे इसको, खोल दो! 
अरे इसको, खोल दो! 

जय प्रकाश मिश्र

पग दो: नाम बड़े और दर्शन थोड़े

बड़ा... 
नाम..., सुना था! 
तेरी..., इस दुनियां! का,
आ.. के, इस पार, 
अपनी दुनियां से, 
तुम्हे, 
देख! लिया, 
नजदीक! से 
आप, सभी महामानवों 
को मिल भी लिया, 
जनम एक, 
बीच आप सभी के
जी... भी लिया।

देखा,
बहुत बड़ा है, 
आसमान! 
उससे बड़े, बड़े
आप सभी के, कैसे
मुंह बाए, अपरंपार अरमान..,
सच में, आप सभी, 
कितने.... हो,  
महान...! 
हर शख्स कैसे, 
कितना.. 
यहां, 
वाकई, वास्तव में 
है परेशान! 
आंखों से अपने देख लिया,
तेरी दुनियां को, आ.. के, देख लिया।

एक टुकड़ा, समय.. का, 
मेरे... पास था, 
जिंदगी, ही 
मेरी, 
तुम इसको कहो..!
यह...
बमुश्किल 
उधार था, मुझको मिला.. 
पर, 
धन्यवाद, 
आप... सबको,
इस बात का...

आप सब ने, इस दुनियां को
सारे स्पीसीज से कितनी
निर्ममता से 
कुटिल चालाकी से 
छीन लिया, 
सारा कुछ आंखों से अपनी 
देख लिया! 

आप! आपस में 
किस शत्रुता से रहते हो, 
रोज ही, युद्ध करते नहीं थकते हो,
बच्चों, बूढों, औरतों, लाचारों
का बिना ख्याल किए
बम वर्षा, बी टू बॉम्बर से
एटॉमिक! 
केमिकल!  बैक्टिरियल! 
कितनी समझदारी से 
सटीक करते हो, 
सारा कुछ देख लिया...।

सभागारों में बैठ! 
रोती!  कलपती!  दुनियां 
को छोड़! उसके हाल पर
बीमारी.. अपने पैसे से, रिसर्च कर 
उनमें बांट...!
किस शानदारी से स्पीच देते हो।

शांति पुरस्कार, 
ईमानदार, 
बिजनेस मैन का खिताब! 
ले, ले.. के, 
पैसे..,
आपस में, ले दे लेते हो...
नंगी आंखों से अपने, देख लिया।

ईश्वर! दुबारा यहां, न भेजे
अरदास इसकी 
आप सबकी
कृपा से मंजूर हो मेरी,
अब आखिरी ख्वाइश मात्र 
यही है बची
इस शताब्दी के जैसे
मानवों से 
दुबारा मुलाकात, कभी भी नहीं हो मेरी।

जय प्रकाश मिश्र



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