पंख फ़ैलाए खड़ी है, सामने..
मित्रों, अपने जीवन का 98.00 प्रतिशत हम अपने अंदर रहते हैं, शेष दो प्रतिशत बाहरी वास्तविक दुनियां में, इस तरह हमारे विचारों की दुनियां हमारा मूल संसार होती हैं। इस प्रकार बाह्य दुनियां मात्र लिफाफा है और बहुत कम महत्व की है। जबकि आंतरिक दुनियां के लिए हमारा प्रयत्न दो प्रतिशत और बाहरी लिफाफे के लिए 98.00 प्रतिशत रहता है, इसी का परिणाम दुख और संताप! आपाधापी का जीवन। इसी पर कुछ लाइने आपके लिए।
विचारों की, एक दुनियां!
लपेटे..
अंदर कहीं,
जीते.. हैं, हम..
प्रिय!
जिंदगी... के, साथ.. इस।
दीखती,
यह है, नहीं,
उम्र भर, है सतत.. चलती
हे मित्र मेरे,
साथ अपने, छाया सरीखी।
जी.. रहे हम,
जाने... न कबसे...
बाल.. पन से..
पर, घिरे..
इन..
विचारों... से, अंदर ही.. अपने।
उर्वरा ये, शक्ति अपनी, मानसिक
सदा.. उठती, सदा.. गिरती,
उठाती मन व्योम, तक
एक क्षण में..
दूसरे ही,
धरातल पर, ला... पटकती।
वह...
दूर.. है,
सत्य... से,
यथार्थ... से,
इस.. जिंदगी के,
आज तक, इस बात को
जानता... तक, ही... नहीं!
एक चश्मा, स्वार्थ का,
अहम, का,
दुनियानवी... स्टेटसो..
का...
लगा कर,
जग देखता है,
वास्तविकता! यहां की
वह, देखता ही
है,
नहीं।
पंख फ़ैलाए खड़ी है,
सामने..
हंसती.. हुई!
खिलती हुई, किसी 'रोज' सी
यह वास्तविकता..!
दुल्हन सी,
मुस्कुराती हे प्रिये,
पर देख... इसको,
रुआंसा... वो हो गया है,
सत्य से डर, रो... रहा है!
सत्य तो, सत्य है
नग्न है
नग्नता का भय,
उसे..., तो.. है नहीं।
निरपेक्ष है, यह वास्तविकता!
एक है, सबके... लिए
कैसे कहूं! एक
दृश्य देखें,
नाज..
था
निज, स्वर्ण.. के आभूषणों पर!
निज, स्वर्ण.. के आभूषणों पर!
वाह वाही लूटता वह
बहुत खुश
था,
देख उन!
देख उन!
प्रिय स्वर्ण को ही,
हे प्रिये! इन दस्यु आगे!
गिड़गिड़ाता, एक क्षण में दुखी था
विचार हैं, मन में उठे..
छिन! न जाएं...
कांपता..,
विचार हैं, मन में उठे..
छिन! न जाएं...
कांपता..,
डर रहा, भयभीत होकर है खड़ा!
देख न! विचार ही हम,
जी रहे, खुश हो रहे,
एक क्षण!
दूसरे
में
रो... रहे।
स्वर्ण, सुख.. थे,
दुःख बने, अब हैं खड़े।
विचार तो
बस.. कल्पना हैं
वास्तविक, बिल्कुल नहीं,
वास्तविकता: सत्य है,
बस.. कल्पना हैं
वास्तविक, बिल्कुल नहीं,
वास्तविकता: सत्य है,
यथार्थ है
ठोस है, श्रम से बनी है,
पर क्या कहूं!
बाहर है प्रिय! अंदर नहीं है!
ठोस है, श्रम से बनी है,
पर क्या कहूं!
बाहर है प्रिय! अंदर नहीं है!
अंदर हूँ!
मैं..
इन विचारों में, सत्य सुन..
दरदराता..
इन विचारों में, सत्य सुन..
दरदराता..
कितने दिनों से पिस रहा हूँ।
इन विचारों में आज तक मै पिस रहा हूँ।
जय प्रकाश मिश्र
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