वह, कहां? कब! मिला किससे?

अंत... 

जिसका.., 

आदि.. जिसका 

शून्य था, मुस्कुराता... 

सत्य...! वह

सामने..., दुनियां मेरी बन

खड़ा था।


प्रिय! 

जग यही था

सोच न! जग, और क्या.. था? 

भाव: संसार में "लोग और वस्तुएं" निरंतर अन्यान्य से मिल रूप लेती और पुरानी हो रूप का परित्याग करतीं एक शून्य से निकलतीं, एक शून्य में जातीं पर हमे हमारे समय के निश्चित अंतराल में सत्य लगती हैं यही यह सतत बनती मिटती सृष्टि या संसार है।

कुछ भी, कह... लो.., 

कुछ भी, सोचो..

कोइ कोण.. 

है..

उसी पर

जग दीखता.. है,

खिलता हुआ, हर... फूल, 

सच है, 

सौंदर्य है, प्रसन्नता है, 

महक है।

पर उसके पहले, ध्यान दें

वह शून्य 

है।

भाव: समय का एक एंगल है, जिसपर हमारी आत्मा शरीर रूप में चेतना के साथ संसार में दिखती है। उस कोण से हटते ही हम या वस्तुएं और यह प्रकृति समाप्त नए का आगमन और इसी के साथ गुण, दोष, खुशी, गमी भी चलती रहती है। यही जग है।

यहीं..., लेता आकृति 

यह...

यहीं,  देता...,

पर, 

पर.. मोह.... है, 

इन... इंद्रियों का, साध्य है, 

बस, इस लिए, इस रूप में, 

यह, 

हमें.., प्रिय.. है।

भाव: हमारा शरीर या हम क्या हैं! मात्र इंद्रियां हैं, जो संसार में सारे संसर्ग और लेन देन करती हैं, जो उन्हें प्रिय वह हमे प्रिय, जैसे, चिकनी सर्फेस छूने में, रंग में तरंग दैर्ध्य की आसानी,  इसी तरह सब कुछ।

सोच न! 

सौंदर्य क्या है? 

रस, ये क्या है? 

पवित्रता!

माधुर्य!

क्या... है?  

सभी भोजन-इंद्रियों* के

दूर उससे*.., अरे! 

कितने*...

पडा जग है।

भाव:'उससे दूर है जग' अर्थात जो आत्मा तत्व है, चेतना है, वह तो मन के भी भीतर है, संसार में जाय संभव ही नहीं, मात्र इंद्रिय की सूचना पर ही प्रसन्न होती है। वास्तव में वह सुगंध से भी सूक्ष्म है। इस तरह संसार का सौंदर्य खुद में है हम मात्र दर्शक ही होते हैं। एक होकर भी हम संसार नहीं हैं।


वह*, कहां? 

कब! 

मिला किससे*? 

सच अलग... सबसे,

जग यहीं था, जग यही है

सोच न! जग, और 

क्या.. था? जग और क्या है? 

भाव: हम सभी अलग अलग यूनिट हैं, अपने कर्म और विचार तक सीमित, आत्म तत्व बाहर निकल किसी को स्पर्श करे, या उसमें मिले संभव नहीं, चेतनाएं संसार की यथार्थता से अनछुई और अप्रभावित ही हैं। संसार की मात्र छाया ही उन्हें खुश कर देती है।


वह*! 

कहां.. कब था? 

एक, गुब्बारा... फुला 

आकाश में, 

था... 

वह... बिचारा... 

आकाश... कब था।

हां प्रिये! जग यही था

सोच न! जग, और क्या.. था? 

भाव: संसार, घर द्वार, संपदा और बच्चे को लोग कहते हैं हमारा है, यह सब गुब्बारे से ही है, दिखता तो है, फटते ही कुछ नहीं, सब अपने अपने में मिल शून्य और यही संसार का खेला है।

यह 

चक्षु...!  

क्या... स्थान हैं?

इन चक्षु बिन! क्या... 'स्थान' है? 

यह "जगह"  क्या है? 

चक्षु बिन सब शून्य है, 

अंधेरों, का राज है। 

कौन कहता, सूरज यहां है, 

प्रकाश है

स्थान, 

इस प्रकाश से, चक्षु से अलग न है।


तो आकाश क्या है, 

मात्र यह संज्ञान है, इन इंद्रियों का...

और क्या? शेष सारा 

शून्य था, शून्य है, 

बस यही जग है,

जो जहां है, वही जग है, शून्य जग है।

भाव: जगह या स्थान एक अनुभूति मात्र है, खालीपन की अनुभूति ही जगह है, यह केवल प्रकाश और नेत्र से ही पकड़ में आती है। निविड अंधकार क्या है, स्थान शून्यता, सूर्य न हो तो, चांद तारे और ब्रह्मांड क्या मस्तिष्क की कल्पना भी शून्य होगी। सभी के आंख न हो तो, सूर्य हो कर भी नहीं है, यह सत्य होता। इस तरह संसार दृष्टि में हो कर भी अनेक दृष्टि से अदृष्ट ही है। और भी प्रकाश सी ही शक्तियां हो जो हमें पता ही नहीं। क्योंकि उसकी इंद्रिय हम पर नहीं।


फिर, पूछती हो, तो सुनो

जग बुलबुला है

सच प्रिये! 

उठता हुआ, खिलता हुआ, 

फूटता.. 

देख कैसे! लुप्त होता

एक क्षण में, 

जग यही था, शून्य था

इससे इतर जग कहां था।

जय प्रकाश मिश्र

लक्ष्यार्थ: 
भोजन-इंद्रियों* सांसारिक माया जाल के घेरे 
वह* मस्तिष्क में रहने वाली चेतना आत्मा
उससे * आत्म तत्व से 
कितने* बहुत ज्यादा दूर, अलग
मिला किससे* चेतना भौतिक नहीं abstract है सेंस है



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