कब तक लिखेगा फूल, पंछी, महल, मदिरा
कब तक लिखेगा
फूल, पंछी, महल, मदिरा!
दम! अगर है,
जिगर! है,
तो,
देश के हालात लिख!
इसलिए लो, बुला लाया,
आज, उसको..
घर पे अपने,
कह.. दिया,
छोड़ सारी, अटकलें,
और, चप्पलें,
बाहर..., वहीं,
फेंक, सारी फूल.. माला
हाथ.. की,
दोने में.. रखी,
गले.. में, पहनी.. हुई,
चाहे किसी हो, रंग... की
सुरभित हो कितनी...! मखमली!
अब चाहता हूँ,
इधर आ!
जी
रही, कैसे यहां है
जिंदगी
तूं...!
दास्तां-ए-हाल को
बेबाक लिख! अब साफ.. लिख!
कठिन है, जीना... यहां...
हर एक पल,
देख कैसे!
परख!
नख-शिख!
भारी है कितना,-
जीवन बिताना, अरे जीना!
सांस लेना, दूषित हवा में
देख न!
दब रही हूँ, पिस रही हूँ,
मर रही हूँ
दिखता नहीं,
किस तरह, मै... जी रही हूँ!
मुफलिसी में,
चूर हूँ, थकावट! से,
मजबूर हूँ, इस व्यवस्था से
अरे!
इसे तूं...! अब....!
बुर्ज-ए-मीनार! लिख!
गर आबरू है,
बची तुझमें! आदमी... की!
आदमी की, जात है, तूं!
तो, आज मेरी "बात*
लिख तूं!
बैठ मेरे साथ
सारी रात,
सारी "रात" लिख तूं!
शपथ है,
तुझको मेरी,
सत्य लिख!
असत्य मत लिख!
स्याह स्याही भले हो
बात को तो "साफ" लिख तूं
इन अंधेरों की बात लिख!
धूमठे हुए, इन घरों में
ऐंठे हुए,
इन हाथ पैरों
गरीबों की बात लिख तूं!
आठ हजारी रुपए पर!
महीने से महीने... तक
आठ से, ले आठ तक
दिन.. निकलते
से लगायत
शाम तक,
बिना टॉयलेट,
आग के
खुले में, ही खट रहे,
इन सर्दियों में
ठिठुरते,
प्रिय! रात भर,
इन संविदा पर लग रहे
दरवान से ले गार्ड तक!
कैसे हैं जीते....!
क्या हैं खाते? क्या बचाते?
कैसे पढ़ाते? कैसे रहते?
अंधा है क्या,
इस शहर में, साथ तेरे!
रह रहे,
परिस्थिति के मारे!
इन सबों का हाल लिख!
कभी देख
आ...
इनके घरों को..
माता पिता को, पत्नियों को
अरे! बेहाल का भी हाल लिख!
मृत से पड़े, बूढ़े, बड़े, बीमार को
कामगारों के अरे!
अपने घरों के...
कैसे हैं वो,
उन पन्नियों के घरों में
इस ठंड में
पानी नहीं, बिजली नहीं
अरे! पैमाल का भी हाल लिख! तूं....
कब तक लिखेगा
फूल, पंछी, महल, मदिरा
दम! अगर है,
जिगर! है,
तो,
देश के हालात लिख!
जय प्रकाश मिश्र
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