मूल मुस्कुरा दे, आदमी कोई यहां रोता हुआ, अमरखा
मित्रों, जीवन एक छलावा, संसार विभ्रम! इसमें दौड़ सदैव अधूरी और लालसाएं अतृप्त! अंतिम प्रहर में भी एक अजीब सी चाह क्यों बची रहती है जब की अमरत्व की नाव "मृत्यु" सामने लग गई है। एक पछतावा क्यों छोड़ता नहीं, इसी पर आपके आनंदर्थ आज की लाइने।
जब बैठता हूं अकेले, खुद पास अपने
मत पूछ मुझसे, किन! खयालों में
डूबता..,
उतराता.. हुआ,
बड़ी.. मुश्किलों.. से,
अरे..! मैं...
बाहर निकलता, सोचता...,
क्या.. कहूं!
तुम... से..
प्रिये!
है.. कोई! डर!
आज भी, अंतर... में,
मेरे...,
गुप.. चुप... छुपा...
जो, आ.. मुझे है.., घेर.. लेता
बज्र सा।
की....
मैं.... अरे..!
अब.., किनारे! बस, हूँ
खड़ा...!
और.. भागता.., दौड़ता..
आंख अपने.. देखकर! इस सत्य को,
विभ्रमित... हूँ! दुखी... हूँ!
"संसार यह 'अंधा हुआ',
किसके पीछे,
हांफता,
दिनरात.. प्रिय! है जा रहा?"
और..
मैं..., ही...,
हूँ.. बचा..,
उस लाभ से, जिसके... लिए,
इतनी.. मशक्कत
से जगत है, भिड़... रहा।
'डर' यही है!
क्या... 'सही' है?
प्रश्न भी तो यही है,
कोई बताए न! हल..., कहीं है?
पर हल ही इसका, 'नहीं... है'।
एक
कमरे.. में, मैं.. बैठा!
आराम.. से, सब.. व्यवस्था.. है,
अच्छा ही.. क्यों,
जो चाह! थी, तमन्ना! थी,
पूरी हुई, हैं आजतक,
हाय! कितनी भर गई..है
जिंदगी हर चीज से,
जो नहीं है, तो जरूरत, उसकी नहीं है
यह सत्य है
आज सबकुछ! बहुत अच्छा चल रहा है।
पर.., एक "पर" है,
भीतर कहीं कुछ दबा है!
अधूरा है!
पूर्ण..? ना, संपूर्ण होना चाहता है !
सच ज्ञान इसका नहीं है
खालीपन कहीं है, आदत ही कह लें!
क्या है, ये...
मुझे, खींचता...,
इस समर.. में
इन दलदलों में,
भीड़ में,
अनमने ही बुलाता है!
फिर सोचता हूँ,
दौड़ पूरी हो गई क्या!
तौलता हूँ, बांट पर, निष्कर्ष सारे!
निष्कर्ष पर मैं, पहुंचता हूँ
क्या मिलेगा?
इन दफ्तियों पर...
जो सड़.. चुकी हैं, बहुत पहले...
भावना सी
अन्दर कहीं, इन सभी के...
कागज चढ़ा, इनपर कोई..
कोई... श्वेत सा
चमचमाता...
नाम मेरा लिख, उसी पर,
रेशमी कपड़ों में रखकर
हाथ मेरे,
दिखावटी एक मिनट के,
किसी उत्सवी माहौल में
सम्मान में, सम्मान से,
सामने..
इन सभी, बटोरे हुए
ही, इन मनुष्यों के, दे ही देगा
तो क्या मिलेगा, छद्म सब, स्वप्न सा!
अरे! छोड़ ये सब, उतर खुद में
छाप दे कोई गीत सुंदर!
मुस्कुरा दे, आदमी रोता हुआ
मुस्कुरा दे, एक कोई!
कम से कम,
आदमी...
वस्तु सा, अमरखा... रोता हुआ।
जय प्रकाश मिश्र
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