पास.. आ, मेरे... मरे! संग... भीग इसमें!

मित्रों, जीवन, और इसका अंतिम लक्ष्य आनंद इन दो पर कुछ लाइने प्रस्तुत हैं, आप अंतिम स्टैंजा जरूर पढ़ें मेरी विनम्र सलाह है। आप को आनंद मिले यह कामना भी।


क्या मानते हैं, आप इसको...

छोड़ 'चेतन' शक्ति को... 

सत्य.. 

है, यह...!

'जड़'.. से अधिक 

संसार यह..., कुछ भी नहीं.. है।


और 

सारी चेतना 

वह..., कहां.. है ?,

'अंर्ततरों' में, इन मानसों में 

मस्तिष्क.. में, इन.., मानवों.. के,

पशु.. पक्षियों के बीच फैली

इस प्रकृति.. में...

एक सी..

ही...

आदि से ले, आज तक,

निर्विघ्न ऐसे..! सदियों से, जैसे...! 


तो.. 

दो, फलक..!  

बिल्कुल, अलग!  

संसार हैं.., स्पष्ट है यह..

एक रूप.. है, संसार... का 

हर.... क्षण बदलता, नवल होता..

दूसरा..., 

स्थाई... है, कुछ, 

जो... हमेशा रूप के अंदर ही रहता..।

उसे,  चेतना.., आत्मा.., 

मैं..  क्या कहूं 

कुछ.. भी 

कहूं

पर

निरवयव यह, 

सदा से है, यहीं... रमता, यहीं रहता ।

खोखला!  यह लिफाफा! 

शरीरों का

सदा इसके साथ रहता।

 

इस... तरह, हर.. रूप ! 

उसका..! 

पात्र 

है,

वह..! 

समाया है, हर जगह!  

हर... कणों में, एक... सा।


पर, विषय इनके 

अलग... हैं,

कारण वहीं, एक स्थूल है, 

एक सूक्ष्म है

एक.., अवयव.. से बना है

दूसरा यह, निरवयव है।


स्थूल का ही रूप होगा,

पर, कुछ.. तो होगा, 

कोई.. वस्तु 

होगा

देह होगी, आकृति एक्चुअल, वर्चुअल 

अन्यथा मिट्टी.. तो होगी.! 

नहीं तो, नष्ट होती 

इसी के उपक्रम

में...  होगी...।


इस तरह दो ही फलक हैं 

रूप... के

एक वस्तु.. कोई काम की , 

अन्यथा देह प्राणी की 

कोई! जीवित है जो

या सहारा है, जीवनों का...

दूसरा, मिट्टी है जो, 

उसे मृत कहो

या मृत्यु का उपक्रम कहो।


चल छोड़ इसको 

संसार में 'फल' बहुत हैं

मीठे भी है, कसैले, कङुए भी हैं

सुख अनेकों हैं, दुख भी हैं 

कुछ गुण भी हैं, अवगुण लिए रस 

और सुंदर, मन भी है...

माधुर्य है, कमनीयता, लावण्य है 

पर सुना है क्या.... 

यहीं... पर, 'आनंद'  है।

यहीं... पर, 'आनंद'  है।


बस, आ गए हम.., छोर पर, अब...

इसके आगे, कुछ... नहीं है

बस इस लिए 

हे!  

प्रिये 

संसार यह है, वस्तु एक! 

और उससे ज्यादा, कुछ नहीं है।

कारण यही है, एक लालच

ब्रह्म को है, चेतना को

मृत्यु को है

और वह आनंद है, आनंद है।

यह विशद है,

रस चेतना है, ब्रह्म.. ही है.

सृष्टि का हर राज यह आनंद ही है।


पर समझ इसको,

निर्झरी यह 

सतत बहती, आनंद झरती 

मात्र बस है जीवनों में,

एक पट है, मृत्यु इससे अलग करती

काल की, रेखा है वो

काजल की पतली

क्षीण होती

एक क्षण में गोद लेती, मुक्त करती।


आ! मिल... तो, इस.. आनंद! से

पूछ..! मुझसे.., प्यार..! से

आनंद..! क्या है? 

अरे! यह...

एक.. नृत्य रे..! 

चेतना का, चेतना संग..

रूप... से, यह..., हीन रे..!

गुण.. नहीं, रस.. नहीं, 

प्रियतमों का, निर...-निसर्गिक...

मुक्त है यह, मिलन.. रे! 

प्रेम.. प्लावन.. 

खेल.. यह! 

दूर 

यह, हर दृष्टि से, 

हर, दूषनो.. से मुक्त रे...!

उन्जाले में बदलते मन-भावने 

परिवेश में.. यह

झीने झीने पटों से, बीच से, है... उभरता

लहर लेता, उर्मियों पर उछलता...

तरंग अद्भुत, फैलता...

 प्रिय, गजब रे! 

कैसे समेटूं! शब्द में इसे,

शब्द सारे... यहां पर हैं, फेल रे! 

कैसा बरसता! अंतर भिगोता

क्या है ये...

सांत्वना है, शांति है, 

अपनापना, विश्रांति है, विभ्रांति है

लटकती, सुख झालरें हैं...

मुक्ति है! शुक्ति है,  शुचि, पवित्रता!  

क्या? कहूं! सब नग्न होकर खड़ी हैं! 

क्या 

यहां है बरसता, 

मत पूछ मुझसे, पास.. आ, मेरे...

मरे! संग...  भीग इसमें,  भीग इसमें! 

आनंद में इस, जड़ कहां!  जीवन कहां! 

मैं तुम कहां 

सब तो प्रिये! निर्मूल है! 

कहां हूँ मैं, तैरता यह जग नहीं! 

कुछ और है, कुछ और है

हां यही आनंद है, हां यही आनंद है।

जय प्रकाश मिश्र


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