जिंदगी, जो... आज! फुर्फुर, उड़ रही है,


जिंदगी, जो... आज! 
फुर फुर, उड़ रही है,
रंग,... बिरंगे, 
बबल.. 
सी,
मुस्कुराती 
कली सम, हमें.. दीखती है।

सुबहो सुबह! हर शाम को, 
यह, पर-कटी सी, 
छरहरी सी, 
परी, 
भौंरा... साथ में  
जो दीखता है, क्या खुशनुमां है..! 

ध्यान दें...
चमकते बाजार में! 
सुर सुरा से.., 
सुरसुराते.. लरज़ते.., 
आधुनिक 
इन.. क्लबों में! 
रेस्तरां.. में!  
महकती, डियोडेंट भीगी 
जुल्फ इनकी 
'पश्चिमी*'.. 
इन हवाओं में, उड़ रही है,
मदहोश होकर, 
देख कैसे बह.. रही है। 

किनकी है, 
ये? 
ये, कौन हैं।।
बताओ न! ये कौन हैं...।।
साठ फीसदी, उधार पर यह जी रही है।
क्रेडिट कार्ड की, है उधारी, 
इन सभी पर
मौज! जिस पर जिंदगी यह कर रही है! 

जिंदगी, जो... आज! 
फुर्फुर, उड़ रही है,
रंग,... बिरंगे, 
बबल.. 
सी,
मुस्कुराती 
कली सम, हमें.. दीखती है।
हवाओं.. 
में..., 
हे मित्र मेरे! 
'पश्चिमी'.., देखें कैसे? 
देखते.. ही, देखते..उनके.. बनाए, 
आतताई, नियोजित, इन यंत्र में 
इन तंत्र में
व्यवसाय के प्रिय! जाल में, 
सट्टा.. लगाती, रजत में
स्वर्ण में, 
देखता हूं!  घिर रही है।

जटिल है संजाल यह!
इंटरनेशनल..!
चाह,
पैदा की गई है, मात्र इनमें,
बाहरी बटने, अरे!  माडल बदल कर! 
कैसी गजब, की बात है,
लाख का, साल का
मोबाइल अरे!
बेकार है! 
आह! 
सच है, दुख! है... मुझे।।
देख इनको..!

हाथ पर, सरसों उगे... 
आज के, 
इन.. परिंदों के
चाह है,
बिना मेहनत, 
बिन जलाए आग!
हलवा, खाएंगे ये...,
बताओ न मित्र मेरे, 
निठल्ले!  
अवसाद में, अरे! क्यों न आ गिरें।
अवसाद में, अरे! क्यों न आ गिरे।

जय प्रकाश मिश्र


Comments

Popular posts from this blog

मेरी, छोटी… सी, बेटी बड़ी हो गई.. जब वो.. पर्दे से

पेंशन बिन जिंदगी, मेरी ये खाली हो गई है।

चलो पेरिस की एक शाम से मिलें!