क्यों! विकल है मन! मेरा?

क्यों!  
विकल है मन! मेरा? 
जब, सामने ही खड़ी हो तुम! 
रश्मि! उजली! लिए, 
मन तन, उर्वशी! 

मधुर.. मधु से, अधिक मीठी...
रस, सरस रसती, 
अरे, तेरी देह कैसी, 
सौष्ठवी..! 
अमृत टपकता!  
अधर जिन! 
तुम.. तो वही अधरावती! 

देखती, 
निर्भाव आँखें, बाल शिशु सी
दीप, अकलुष दीपती... 
झील सी, मोती समोती 
अंतर में अपने.. 
दृश्य पूरा, एक क्षण में 
भीगो देती, दृष्टि के पटक्षेप  से, 
करुणार्द्र कैसी ओस! सी 
शांत करतीं, शांत..,  
स्मित..! 
पंखुरी हों, सरोरूह 
लाल, चंदन में
पुती।

इस तरह
स्पर्श देती
मृदुल माधुर, प्रेम स्नेहिल! 
और क्या अब चाहिए!  
तुष्ट हों मन, 
बता न! यह चाहिए था
मिल तुम्हे....
फिर क्यों, विकल है, 
मेरा मन! 
जब, सामने ही खड़ी हो तुम! 
रश्मि! उजली! उर्वशी! 

मानुष... 
प्रिये... मैं! 
माटी का पुतला,
प्रीति मेरी, मिट्टियों की,
अमरत्व क्या है?  क्या मैं जानूं?  
स्वर्ग की ही, अप्सरा तूं! 

तृप्ति मुझसे दूर है रे! 
अतृप्त मेरी
लालसा,
तोड़ लूं मैं, पुष्प को, 
अरि!  खिलखिलाते हंसते हुए, 
महकते आज के प्रातः खिले, 
एक क्षण में
नोच दूं! हर पंखुरी! 
बेवजह!  
बिना.. 
सोचे, बिना समझे, 
इस लिए मुझे, ही क्यों
हम सभी को श्राप है,
विकल रह तूं! 

पास... तेरे 
चाहे... 
कोई.. भी, अप्सरा हो, स्वर्ग की । 
समृद्धि हो, साम्राज्य हो, 
सारा जहां हो, पर विकल रह तूं।

क्यों!  
विकल है मन! मेरा? 
जब, सामने ही खड़ी हो तुम! 
रश्मि! उजली! 
लिए मन तन, बता न!  ऐ, उर्वशी! 

जय प्रकाश मिश्र




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