जीत कर.., बताओ न! क्या... मिला?

मित्रों, आज "युद्ध"  विश्व की भयानक विभीषिका बना हुआ है। इसी पर एक पराजित देश का नागरिक विजेता से बात करता उसे सत्य और सच्चाई दिखा रहा है। विजित मातृभूमि अंत में विजेता को धिक्कारती है। इसी पर कुछ लाइने।

पूछता हूँ, जीत कर.., बताओ न! 

क्या... मिला?

संतोष! बेहतर! 

मिल गया... सुख!  भर गया मन!  

और क्या तुम्हे चाहिए ? 

हे पतित... तम! 


सनक....थी,   बेहूदगी... थी 

बोल.. न..! पूरी... हुई?  

दरिद्र थे तुम ! इसके पहले...

दरिंदे.... थे ! 

आतताई..,  जंगली..., थे

कुटिल.. मन थे,  लालची.. थे, 

जरूरत,  इस युद्ध से, पूरी..... हुई? 


क्या... चाहिए था, 

बताओ 

न....! 

पा... गए...

उजड़े हुए घर, बिना छत...

लो... इन्हें, और लो......

लाशे.... बिछी, 

पूछता हूँ, बताओ न! 

जीत... क्या, यह जरूरी थी?


रोते... हुए, 

बच्चे..., ये लो...! 

जिंदगी... लो झूलती !  

टांगों बिना, सभी.. में गोली लगी,

पूछता हूँ, बताओ न! 

जीत क्या यह जरूरी थी?


सिसकती...  कुछ बच्चियां... हैं,

सुबुकती...

बूढ़े... 

बिलखते, 

मां... कलपती,

पूछता हूँ, बताओ न! 

जीत क्या यह जरूरी थी?


और... क्या, तुम्हे चाहिए ?

बताओ न... ! 

भूख से, छटपटाती, मर रही

चिड़िया कोई..... 

कौआ हो तुम ! श्रृगाल हो ! 

हे!  जंगली... !

पूछता हूँ, बताओ न!  

जीत क्या, यह... जरूरी थी।


आ..., 

पास, आ...

देख ना... ! ढह गया, 

साम्राज्य.. वह ! 

चिढ़....! तुझे, 

जिससे... बड़ी थी !

पूछता हूँ, बताओ न! 

जीत क्या यह जरूरी थी?


साम्राज्य तेरा हो गया? 

अब... 

घर हुए, कंक्रीट... 

सब...

बुझ.. गया, हर घर का, दीपक..

जम गए, बिन तेल... बिजली...

देख कैसे? बर्फ हो तन...!

हे आतताई !  

आदमी है, अरे तूं! 

कभी शर्म तो कर...!

पूछता हूँ, बताओ न! 

जीत क्या यह जरूरी थी?


और क्या कंकाल!  

लेगा.....?

व्यापार! तूं...,  इनका करेगा!

आज का, बदला हुआ, 

आक्रांता....! 

नहीं.... रे.....

अरे, हां, व्यापारी..... है, तूं! 


बेशक बुरा था, राज्य वह

तुझे देखने में,, दूर से

कैसे "भी"  थे,

अपने थे..

"वे" 

निपट लेते.., लड़-लड़,  सुलझ-ते

तुम! समय देते,  बड़े.... थे

कुछ, रूष्ट... थे,

समझाते... उन्हें

अवसर तो देते... !

पर नहीं 

तुम 'ताक' में थे

नीयत गलत थी तुम्हारी, तुम.. दुष्ट थे।


बर्बाद कर एक देश को

तुम्हे क्या मिला !

लोग खुश थे

जिंदगी में, 

उनको रुला! तुझे.. क्या मिला !


अब लो अरे हे, क्रूर! 

नोचो! "उर"  हमारा, "चोंच"  से 

खनिज हूँ मैं,

इस देश की, मिट्टी भी हूँ।


मां.... हूँ, 

मैं...

उन सभी... की 

लड़ते हुए, जो मर गए। 

इस देश पर, आहत हुए, 

ढेर होकर, सड़ गए...।


पर ध्यान से सुन! 

अरे वे....

फिर से उगेंगे

लड़ते हुए जो मर नहीं, अमृत बने।


जय प्रकाश मिश्र 




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