तो.., समझना, जिंदगी अब... खिल रही है,
मित्रों, एक लंबी और श्रम साध्य कविता भेज रहा हूं, अंत तक पढ़ेंगे तो शायद कुछ अच्छा जरूर लगेगा ऐसा मेरा प्रयास है।
एक
टपकन'
अपने दिल की..
संग, प्रिय....
किसी.. और, दिल.. की,
एक.. लय..
एक.. ताल.. होकर
जब... 'बज..' उठे!
टपकन'
अपने दिल की..
संग, प्रिय....
किसी.. और, दिल.. की,
एक.. लय..
एक.. ताल.. होकर
जब... 'बज..' उठे!
अंदर.. कहीं,
बिन, किसी.. आवाज रे!
'विद्युतिक' झंकार.. ले!
तो.., समझना,
जिंदगी
अब...
खिल रही है,
'पुष्प' लेती फ़ुनगती..!
'विद्युतिक' झंकार.. ले!
तो.., समझना,
जिंदगी
अब...
खिल रही है,
'पुष्प' लेती फ़ुनगती..!
मधु देश में.. यह बढ़ रही है..।
इतना
ही... क्यूं..
जब, रंग.. लेकर...! 'गुलाबी...',
यह...! झांकती.. है
स्नेह ले...
किसी दूसरे की, आंख.. में
'शर्म..' से,
'झुकते..' नयन ले!
उसी क्षण, मुस्कान मुख पर
तैरती... हो..
'तप्त' करती, मुख, अधर को...
तो.., समझना,
जिंदगी
अब...
खिल रही है, प्रभा! ले.. ले..!
और.. क्या है,
'शर्म..' से,
'झुकते..' नयन ले!
उसी क्षण, मुस्कान मुख पर
तैरती... हो..
'तप्त' करती, मुख, अधर को...
तो.., समझना,
जिंदगी
अब...
खिल रही है, प्रभा! ले.. ले..!
और.. क्या है,
'पुष्प' लेती फ़ुनगती..!
प्रिय! जिंदगी... यह।
अभी तो,
वह सरल थी,
मन... 'तरल' थी,
कच्ची उमर, 'कपास' की
वह, दुग्ध उज्ज्वल
फली थी,
कच्ची उमर, 'कपास' की
वह, दुग्ध उज्ज्वल
फली थी,
लली
थी,
उर में जिसके
पवित्रता..
शुभ्रता..
ही..
भरी.. थी!
कली के भी 'पूर्व',
थी,
उर में जिसके
पवित्रता..
शुभ्रता..
ही..
भरी.. थी!
कली के भी 'पूर्व',
फ़ुनगी.., बस अभी..,
'हरस' भर, कर! बढी... थी!
और, उसको... सीखना... है,
जानना है, कुटिल..!
प्रिय.., संसार यह..!
नहीं..
है, जो..
धवल.., पावन..,
बल्कि, है यह, सच कहूं!
जानना है, कुटिल..!
प्रिय.., संसार यह..!
नहीं..
है, जो..
धवल.., पावन..,
बल्कि, है यह, सच कहूं!
तो, हेय-तर..,!
मुखौटा...
पहने, सभी है,
सभ्य इसके! देख कैसे..!
लोग... सच्चे, भी हैं
जो अधिकतर
वे.... सच
सभ्य इसके! देख कैसे..!
लोग... सच्चे, भी हैं
जो अधिकतर
वे.... सच
कहेंगे,
सदा.. उस से,
सामान्यतः संभव नहीं... हैं।
सदा.. उस से,
सामान्यतः संभव नहीं... हैं।
हां...
ये.. सच है,
बुराई.. की उम्र,
कमतर, सदा... से है,
सद्गुणों... की धूप से, यह
कमजोर.. होकर, सूखती.. है।
ये.. सच है,
बुराई.. की उम्र,
कमतर, सदा... से है,
सद्गुणों... की धूप से, यह
कमजोर.. होकर, सूखती.. है।
जन्म
लेता, एक
हीरो.. इसलिए.. है,
उससे.. पहले, दुष्ट कोई
उससे.. पहले, दुष्ट कोई
अधम.. रहता, दुखी.. करता,
आम... जन को, प्रिय...! वहीं है।
एक "सच" रहता सदा है,
आचरण बन हर
एक "सच" रहता सदा है,
आचरण बन हर
जगह
हराने को भयानक,
वीभत्स, बलशाली अचल को।
हराने को भयानक,
वीभत्स, बलशाली अचल को।
शिखर...!
है..., वह..!
बस.. इसलिए
कि.. गर्त! है, चहुंओर... उसके,
बस.. इसलिए
कि.. गर्त! है, चहुंओर... उसके,
शत्रु है, यदि सामने.. दुःधर्ष,
तो, यह जान लो,
मित्र भी हैं,
तो, यह जान लो,
मित्र भी हैं,
दूर न,
प्रिय पास तेरे।
मुश्किल नहीं है निपटना
अरे! उस शैतान से,
जो चर्म भर
बस
प्रिय पास तेरे।
मुश्किल नहीं है निपटना
अरे! उस शैतान से,
जो चर्म भर
बस
रूप है,
सागर लहर,
सागर लहर,
विकराल, जो दिखता हमे।
तूं..!
डर नहीं,
तूं.... निडर हो!
भर उठा है पाप उसका,
भर उठा है पाप उसका,
गले ऊपर, सत्य है ये
मान मेरी अवरोध..
दे, तूं...! मात्र..
बस, और
देख..
तो
पक.
पक.
गए हैं, पाप उसके
और वह उन भार से गिरने को है।
भीतर, खिलाओ
पुष्प सुंदर भावना का,
आदर करो इस नियति के
हर रूप का।
मुस्कुराओ, राज सीखो
प्रकृति का
क्यों मुस्कुराती, नित्य यह
खिलती कली के अधर पर...।
हर रूप का।
मुस्कुराओ, राज सीखो
प्रकृति का
क्यों मुस्कुराती, नित्य यह
खिलती कली के अधर पर...।
दुनियां है सुंदर!
सजाई!
मिल, हम सभी ने,
परिश्रम से, आज तक!
और भी, बाकी था जो..
वह लिख गया है,
पुस्तकों.. में, जाने न कबसे..
फिर भी बहुत है, खोजने को
खोजना अंतर में
अपने..
हृदय, मन में
देखना जब उड़ रहा हो
अकेले
पंछी गगन में।
पूछना
इस नियति का
हर... राज, उससे...।
फूलते... हैं कमल कैसे?
ताल... में, किसी झील... में
निर्जन... बिजन, के जंगलों... में
आवाज, इतनी मधुर
कैसे बोलती है
कोयलें,
ये
मोरनी, नदिया ये बहती...
पहाड़ों पर सूखते, उस शिखर ऊपर
अग्नि मुख में तपते हुए,
पहाड़ों पर सूखते, उस शिखर ऊपर
अग्नि मुख में तपते हुए,
लाल रक्तिम!
पुष्प खिलते किसलिए!
किसके लिए!
और,
मुफलिसी के दिनों में भी
बिचारे, इन कुवांरो के
मन, हृदय में,
पुष्प खिलते किसलिए!
किसके लिए!
और,
मुफलिसी के दिनों में भी
बिचारे, इन कुवांरो के
मन, हृदय में,
आशा...,
भरी ये, कोपले फूटतीं हैं किसलिए।
हारना भी परम सुख है,
सोचें.. अगर, तो,
तथ्य फ़ुल है,
जीतने
से,
उस जीत से..
मिली.. हो, छद्म.. से,
असत्य.. से, धोखा धडी से।
हारना भी परम सुख है,
सोचें.. अगर, तो,
तथ्य फ़ुल है,
जीतने
से,
उस जीत से..
मिली.. हो, छद्म.. से,
असत्य.. से, धोखा धडी से।
विश्वास खुद पर,
बड़ा है
जब घिरे हों
हम, बीच में, उन बादलों के
डरावने, काले, भयंकर, विशाल है जो
देखने... में,
पर जान लें, सूखे हैं, ये...
हृदय से, अंदर कही से।।
समय कुछ हम
गुजारें
उन
सीधे साधे गरीबों के बीच में
मात्र श्रम पूंजी है, बस जिनके लिए।
भागती किसी भीड़ का
हम भाग न हों
भागते हर शख्स से
सोच अपनी अलग रखें..
राह चलते, मित्र इसको बदल न दें।
सुनना 'कला' है,
सांत्वना है,
आतिथेय, 'स्तर प्रथम' है,
पधारे, किसी अतिथि
का..,
यह मान है,
यह... याद रखें।
दुःखी है, वह अगरचे,
ढाढस बधाएं, प्यार दें, नियम यही है।
इसलिए,
सबकी... सुनें,
छाने... इसे, विवेक.. पर,
तौलें... इसे,
जरूरत भर, पास रखें,
शेष को,
जरूरत भर, पास रखें,
शेष को,
शीघ्र ही, विर्सजित भी कर दें।
ध्यान न लें।
ध्यान न लें।
एक.. मज़ा है, हारने... में,
चुभन... में, भूख.. में
मुफलिसी में,
सहन...
में,
कड़ुई, किसी भी बात में
बेरुखे, माहौल में
सच कहूं!
मिलते
है
हम "हमीं" से,
मात्र, इन कुछ ही, क्षणों में।
अच्छा है,
ये...,
जब.. तक जियो,
खुल... कर जिओ!
क्यों करो?
ऐसा!
अरे! तुम,
मुंह छुपा! छुपकर रहो!
शर्मिंदगी! तुम्हे...
क्यों.. लगे!
यदि
गलत कर, बैठे
हो तुम! अच्छा है ये
रोने लगो, तुम खूब रोओ!
आंसुओं से पाप को धुलने तो दो।
रोने लगो, तुम खूब रोओ!
आंसुओं से पाप को धुलने तो दो।
जरूरत पर बेच देना,
सर्वस्व... अपना,
शरीर अपनी
पर आत्मा, और दिल
तुम्हारा...
कभी... भी,
पास, उसके गिरवी न हो।
झूठ...,
बोले, जोर... से,
शोर... का वह, सहारा ले,
भीड़ बन तुम्हे घेर ले
बादलों सा,
सामने..
से
हटता... न हो!
बोलना, तुम बात सच्ची!
बंद करना कान
अपने...
सोचकर, कोई... नहीं,
आवाज.. वह....
गीदड़ो... का, झुंड.. है,
हुंकार है बस,
कुछ ही क्षणों की, मिटने उसे दो।
हटता... न हो!
बोलना, तुम बात सच्ची!
बंद करना कान
अपने...
सोचकर, कोई... नहीं,
आवाज.. वह....
गीदड़ो... का, झुंड.. है,
हुंकार है बस,
कुछ ही क्षणों की, मिटने उसे दो।
कठिनाइयां तो
आएंगी...,
तपन... होगी, रास्तों... में,
पैर भी जल जाएगा..,
अरे! .
टेंपरेचर... चाहिए,
कुछ तो... अधिक!
सोच ना,
कोयले को चमकता हीरा...
बनाने.... के, लिए।
बनाने.... के, लिए।
आग!
हां, 'आग'
रहनी... चाहिए
अंदर कहीं, हर राख में,
अंदर कहीं, हर राख में,
हर शख्स में, जिंदा हमेशा
पर, राख ठंडी ही रहे,
अच्छा है
ये...,
देख कर! भांपकर!
मर्म, या अभिप्राय!
पापी.., दुष्ट..
का
बहती हवाओं संग,
तेरी आग यह,
पर, राख ठंडी ही रहे,
अच्छा है
ये...,
देख कर! भांपकर!
मर्म, या अभिप्राय!
पापी.., दुष्ट..
का
बहती हवाओं संग,
तेरी आग यह,
बेहतर, धधकनी.. चाहिए।
डगमग
न.. हो यह नाव..
अपनी.. "निज-विश्वास" की
अटल रहनी चाहिए,
पीछे... लगेगा...,
"काई.." है
जग.. यह, स्वार्थी... है,
बहता.. हुआ, पात.. है, बस
मतलब से अपने,
यह ध्यान रखना चाहिए।
एक 'टपकन' अपने दिल की..
संग.. प्रिय किसी दूसरे की,
एक लय
एक
ताल में
मिल, 'बज' उठे!
जब 'विद्युतिक' झंकार ले!
कोई रंग लेकर! 'गुलाबी'!
झांकती, एक दूसरे को
'शर्म'.. से,
'झुकते' नयन! ले
'तप्त' होते, मुख, अधर ...
तो समझना,
अब...
खिल रही, प्रभा! प्रिय!
जिंदगी की,
और.. क्या है, 'पुष्प' लेती जिंदगी यह!
और.. क्या है, 'पुष्प' लेती जिंदगी यह!
जय प्रकाश मिश्र
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