देखा है मैने.. हिमालय... को, साधुओं... सा,

मित्रों, हिमालय महान! शिव की भूमि और मौन की राजधानी, सौंदर्य का जादू, अप्रतिम, अतुलनीय और अकेला। यह साधुओं सा बिरस, अकेले, शांत, शीतल है इसी पर कुछ लाइने आप के लिए।

देखा है मैने..
हिमालय... को, साधुओं... सा, 
नंगधड़ंगा..., 
गेरूए, वस्त्रों... में, लिपटा !

नित्य 
प्रातः हे प्रिये!  
जब..., दिन निकलता...।
भोर में, ऊषा के पीछे दौड़ता...
अरुण वह!  छोड़... देता, भूलवश!  
निज रंग पूरा, लालिमा... का
इतनी विशद, फैली हुई 
हिमराशि ऊपर
गेरुआ...।
देखा है मैने..
हिमालय... को, साधुओं... सा।

ओढ लेता, 
रेशमी चीनांशुका 
हर अंग अपने कौस्तुभ मणि 
सा चमकता,
यह... हिमालय 
इतना विपुल, बस एक क्षण में
रंग.. उसी के, यह रंगा...
लालिमा ले अंक में,  
हर शाम को भी, इस तरह ही 
सुरमई सा गेरुआ..
देखा है मैने..
हिमालय... को, साधुओं... सा।

हर रात इसको देखता हूँ
चांदनी में, चाव से
लिपटा हुआ, 
रजत की उस भस्म में,
शिव ही खड़े हों, सामने 
मेरे भस्म पोते..! 
निर्लिप्त चम! चम! 
चहुंओर अपने! 
अहे! कैसा चमचमाता...
देखा है मैने.. हिमालय... को
चुप अकेले, आनंद में प्रिय! 
मुस्कुराता...!
अहा! कैसा आभा... भरा! 
देखा है मैने..
हिमालय... को, साधुओं... सा।

शांत चुप, 
रमणीय.. आभा,
मस्तकों पर शुभ्र पगड़ी, रजत की 
चम चम चमकती
झक् सफेदी बादलों की, सिर पे उड़ती
रश्मियों में, सूर्य की, आकाश से ऊंचे 
शिखर पर यह नहाता...
निदाग् उज्ज्वल,
हराहराता...
सूर्य की, बेलौस धुन में गुनगुनाता
देखा है मैने..
हिमालय... को, साधुओं... सा।

मौन में यह आ रमा है,
रमा से अति दूर है,
शीत की, निर्मम हवाएं झेलता यह
संसार की हर गति विधि से दूर है।
तोड़ता है गर्व यह, आज भी
हम मानवों का...
देखा है मैने..
हिमालय... को, साधुओं... सा।
नंगधड़ंगा..., 
गेरूए, वस्त्रों... में, लिपटा !
गेरूए, वस्त्रों... में, लिपटा !

जय प्रकाश मिश्र

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