तान.. तनते, वितान बुनते, उम्र..बीती अरे ये!
मित्रों, जीवन की वास्तविक जरूरत उतनी नहीं जितने के लिए हम जीवन भर दुखी रहे। मात्र भविष्य का भय हमें दौड़ाता रहता है और सुखी जीवन के लिए समिधा बटोरने में ही हम अंतिम स्टेप्स पर खुद को खड़ा पाते हैं। इसी पर यह रस-यायावरी आपको सुपुर्द है।
दुनियां ये अपनी, कम नहीं थी..,
सागर ही थी, फैली.. हुई,
दूर.. तक,
यह! बहुत.. गहरी!
रत्न.. इसमें,
अरे..!
कितने..!
क्या... कहूं!
बिखरे.. पड़े!, बिखरे पड़े!
समंदर से, अधिक,
प्रिय...!
पर, और.. गहरे! और गहरे!
सच कह रहा हूं!
मणि, रत्न, से भी... कीमती,
सु-स्वर्ण से भी सुनहरे!
सारे
यहीं... थे,
जी... रहे, तान.. तनते
वितान, बुनते, उम्र.. भर, तकनीक ले,
इस, समंदर में,
ढूंढते.., खोजते.., जुगत करते,
प्रयत्न.. करते, जान.. दे.. दे..,
चौबीस.. घंटे! सोते.. नहीं थे,
देखा है उनको...
काम.. के ही लिए, प्रिय!
मसान..! बनते,
पर "ढाक के तिन" पात होते!
जीवन कठिन प्रिय, उनको जीते।
और "गोताखोर" कुछ थे!
अनुभवी, डुबकी लगाते, सांस बांधे,
इस, समंदर में, विश्व के
एक बार ही, और निकलते,
ले हाथ दोनों,
एक क्यों..
रत्न, दो.. दो..
अरे..
वे...,
बिन, परिश्रम.. के
क्या.. कहूं! भाग्य इसको
कर्म का, प्रारब्ध.. इसको..!
हे मित्र! मेरे..
मैं, खुद..! चकित... हूँ!
आज तक, देख कर
इतने निकट से, विश्व.. को
कोई नहीं, विधान प्रचलित,
एक हो, जो विश्व में।
इस लिए,
बस... इतना
है, कहना मात्र! मुझको...
मित्र हे,
पहले चरण में शांत हों..
हर तरह से, शांत हो
अनुभव बटोरें, संयमी हो..
धीमे.. धीमे...
कूद कर,
किसी ऊंचाई पर
याद रख़े, मत चढ़ें! तो मत चढ़ें।
दोष मत दें अन्य को
कुछ नया सीखे,
दुनियां यही थी, दुनियां यही है
और आगे भी, रहेगी... यही.. ही,
यह याद रखो, दोष इसको
आगे से देना, बंद कर दो।
जिंदगी की डोर, अपने हाथ रखो
उतना उड़ो, उतना उड़ाओ
हवाओं में,
इस, जिंदगी को
गिरो तो, बर्बाद.. न हो।
समस्याएं एक हैं, सबके लिए,
इसे समझ लो, भ्रम मत करो..
जो जहां है, परेशाँ है,
और आगे के लिए,
बस.. और आगे के लिए..।
जरूरत से, दौड़ है यह,
अरे! नहीं रे!
जरूरत तो बहुत कम है,
जिन्दगी सुख से, बिताने के लिए
मित्र यह घुड़दौड़ है,
फर्स्ट आने के लिए।
पतंग अपनी, शेष सबसे,
ऊंचे...
उड़ाने के लिए...।
इसलिए
तुम सब्र रखो
सादगी से, नम्रता से
शुद्धता ले, प्रेम भर, प्रिय! तुम जियो।
जय प्रकाश मिश्र
Comments
Post a Comment