कब.. तक, छुपोगे? कृष्ण मेरे, श्याम मेरे!

कब.. तक, छुपोगे?   
हे...,
इष्ट.. मेरे? 
जानता... हूँ! 
सामने.., आओगे, 
एक.. दिन! मिलोगे, तुम!  
प्रतीक्षा, मेरी है इतनी अधीरतर ! 

इस लिए 
हे! प्राण पति! 
कर बद्ध है, यह प्रार्थना!  
"छल" ! 
मत.. करो, 
तुम, अब, मेरे संग।

कितने... 
दिनों.. तक, 
राह... देखूं! अपलक! 
क्या चाहते हो, 
हे, हरि! 'हरे'..
हे..., 
मधुर मन ! 

भरमता... हूं, 
नित्य.. ही, 
वैभव... में, तेरे! 
देखता..., 
मंदिर, मनोहर..., अनुपमम्। 

और उनमें, 
तदमये!
ये... भक्त.. तेरे, 
हे..., 
हरे...!  
कितने..? सरल.., 
मीठे.., मिठे, सीधे, भले! 
कमनीयतम्।

हूँ,! 
जानता.., 
चमकती...., 
मन... मोहती, 
ध्यान मेरा, खींचती, 
साथ में, दृष्टिपथ, यह...समोती, 
इन नेत्र को, मेरे अश्रु संग।
यह मूर्ति तेरी 
और तेरी...! 

मुकुट, मणि... 
यह.... 
"तुम" नहीं हो! 
"श्रीहरे." 
कुछ नहीं यह, स्वर्ण! चम!चम!  

यह.., 
चमकता, 
जो दीपता..... है,
दूर... से, 
नेत्र! मेरे खींचता., 
हृदय अभिगम! 
मुकुट बन! 
अभिलाष..! जन.. मन.., 
यह, तुम.! 
नहीं 
हो, 
श्रीहरे ! मात्र सब, 
स्वर्ण! चम!चम!  

आकर्षण "तुम्हारा" अलग है, 
सदा से
इस, निखालिस 
चौबीस... कैरेट, स्वर्ण.. से,
स्यमंतक-मणि की...
चमक से,
पर, 
मैं 
अधम! 
आज भी हूँ , भरम... जाता, 
नित्य.. ही, 
वैभव... में, तेरे! हे, हरे! 
मैं ही अधम...तम...! 
धृष्टतम! 

तुम, नहीं, 
तुम कहां सौंदर्य! हो?  
इन... 
निसर्गिक! 
निष्कलुष! निष्पाप!  
तकते, बाल शिशु से, नेत्र में... 
अरे ना, 
तूं कभी ना, 
लावण्य हो, ना अनुपमम! 

किसने कहा कि रूप हो, तुम? 
बताओ न! 
खिलते हुए, बोलते, तराशे! इन! 
नम्र, विनयी, सौम्य लगते, 
पत्थरों में।
हे हरी, 
तूं! 
कब थे बसते? 
सच है ये, तुम राम थे, कृष्ण थे
वीर, अद्भुत, दुष्ट दलन, 
पराक्रम! 

कब.. तक, छुपोगे?   
हे...,
इष्ट.. मेरे? 
जानता... हूँ! 
सामने.., आओगे, 
एक.. दिन! मिलोगे, तुम!  
प्रतीक्षा, मेरी है इतनी, अधीरतम ! 

अरे यह तो, ललक है
सम्मान है, 
तूं 
श्रेष्ठ.. है, 
संसार की इन, काइयों से 
विलग है,
मानवी मन! के कलुष से दूर है।
इस लिए तेरी "मूर्ति" सबसे अलग है।

शालीनता, इस मूर्ति की
है, किरण.. तेरी,
आकर्षण तुम्हारा, 
मूर्ति, उसका है, नजारा!  

एक छाया प्रेम की 
जो झांकती है 
अयन से इस मूर्ति के
तेरा..., इशारा।

साथ में जो झांकती, 
करुणा, दया, 
संग वीरता 
दीखती है, शरण तेरी शीतली 
अवयव हैं तेरे, 
हे....! 
हरी... मोरे..।

झांकी!  
तेरे इस मूर्ति की, 
जो साथ, तेरे..., 
हे प्रभू...., मेरे...
इसलिए यह पूज्य है, 
एक ग्लिंप्स तेरी, हम सभी को, 
इन सभी में, सनातन से, दी...खती है।

पीत पीताम्बर तुम्हारा, 
हल्का सुनहरा 
लहरता, 
उपवीत सुंदर! 
यह तुम नहीं, उपधान तेरा।

तूं अलग है, लुभाती, बुलाती
वैजयंती माल से इस 
ताजी, महकती, 
बांधती, 
मन
अरे! यह श्रृंगार तेरा, वस्त्र तेरा।

जानता हूँ, मैं तुम्हे 
पहचानता 
हूँ
तूं इन सभी से अलग है तूं।
अपनी तरह तुझे मानता हूँ
इसलिए यह जानता हूँ
शरीर भी तूं नहीं है,
यह आंख तेरी
मेरी तरह ही आंख है,
दृष्टि सुंदर, अजनबी,
कोई और है।

अयन तेरा गुलाबी, 
लुभाता मन 
यह नासिका, ये लटकते 
कर्ण दोनों
तूं नहीं, 
तूं 
इन सभी के बीच ही
कुछ अलग है।

रेख काली, अरे क्या है..
धूमिल सी होती
'श्याम' है,
बस पूछता हूँ 
जानता हूँ, यह नाम तेरा! 

विंदु कोई कृष्णिका है
तेज है,
लालिमा है सूर्य की
क्या सत्य है
चल आ इसे अब ढूंढता हूं।
चल आ तुम्हे! मैं ढूंढता हूं।

जय प्रकाश मिश्र

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