आओ चलें एक बार फिर गलियों में उन।

मित्रों, जीवन के सुनहले सुंदर क्षण फिर लौट कर दुबारा नहीं आते। मन जब संसार के ऊहापोह में रच जाता है और मकड़ जाले फंस जाता है तो वे उन्मुक्त और निर्बाध बिताए समय याद आते हैं। इसी पर यह रचना आपके आनंदार्थ प्रस्तुत है।

आओ.., 
चलें... एक बार! 
हम...तुम..! 
गलियों... में, 
उन..! 
अल्हर.., किशोरी.., 
बचपनी.., 
रसमयी..यादों में फिर! 

अनुराग.., राग.., 
प्रहर्षिनी..!  
भूलीं! हुईं, बिसरी! हुईं 
छूटी..! हुईं, 
दूर.. 
प्रिय!  अब स्मृति में
रह.. गईं, 
भागते जीवन में इस! हर एक दिन! 

फिर,  
साथ... मिल..., 
उस...  ही.. तरह..!  
जब, देखकर..! 
आंखों के, कोनों.. से, 
हमें.. 
मुस्कुरा.. देते थे, 
बूढ़े...! 
चाय.. पीते....,
कुछ..! बातें 
अपनी.... याद.. कर! 
दिल.. थामकर! 

सड़कों किनारे, इशारों में 
चुटुकते.. 
शर्म आती थी उन्हें
हमें देखते..!  
कैसे कहूं..!
आओ.., 
चलें... एक बार! 
हम...तुम..! गलियों... में, उन..!
झरोखों से, देखते हैं, साथ मिल! 

सर्द... मौसम, 
सुहाना था, 
कुहरा.. भरा था,
बादलों.. सा कुहासा.. 
घेरे खड़ा था।
बाहों में अपने.. खींचता था
हर तरफ, किस प्यार से..
कुछ याद से...! 

दिन गजब! थे,
सरसराती, शिशिर की ठंडी 
हवा में, 
एकवस्त्रा.. हुए 
हम तुम बैठते,
उसके आगे बात! मैं.. 
कैसे कहूं! 
आओ.., चलें... एक बार! 
हम...तुम..! घूम आएं
आज फिर, गलियों... में, उन..! 

दिसंबर का, महीना था
लास्ट था, 
शिशिर का अंतिम 
चरण था
ऋतुराज, लुक.. छुप.. 
झांकता था, 
आंगनों... में।

बादल घिरे थे, आसमां में
हवाएं कितनी मधुर थीं।
हाथ देखे हाथ को, 
बस, आंख देखे.., 
आंख को,
एक.. 
दूसरे से सटे हम...
घूमते 
हर, छुट्टियों में...
हो थकित! 
आओ चलें एक बार!
हम.... गलियों... में, उन..
भीग जाएं पसीनों में आज फिर।


शाम थी,
बरसात की..
ठिठुरती वह, सुरमई! 
अंधेर होती, 
स्याह सी
लालिमा ले, कालिमा, 
चादर चढ़ी, आकाश में थी, 
हवाएं, 
बेसुध किए, कैसी बहतीं...
आओ चलें एक बार!
हम.. तुम 
मिल प्रिये, गलियों... में, उन..।

झोंके... हवा के 
छेड़ते.. थे, 
सामने 
तेरे, मुझे.. तुम
चुप खड़े थे, बाल मेरे 
कैसे.. उड़ते, सूखे.. सूखे.. रश्मियों से
तुफ़ाँ हुईं, वे हवाएं!  
खेलती पेड़ों 
से इन,
तानती  हों, डालियां 
अंगों को, अपने
उतावली, हो.. हो.. के, पीछे... 
लजाते पत्ते छुपाते, लाज अपनी।
आओ चलें एक बार!
हम.... गलियों... में, उन..
फिर मिलें गढ्ढों से उन! 

याद!  कर... तब, 
अंधेरों में
छरक!  पानी, बरसता था,
नाचता था, ताल पर
मृदंग सा..
छम छम!  छमाछम! 

पास में ही, 
तल रही थी तवे पर, 
वो.. चांदनी, गरमा गरम! 
बिल्कुल नरम, 
आलू की. टिकिया...
सांवले साजन के संग,
खडी हो, 
किस प्यार से, खाते थे हम तुम!
आओ चलें एक बार!
हम.... गलियों... में, उन..।

आओ चलें एक बार!
हम...तुम..
गलियों... में, उन..
जिन्हें देखकर.., 
आंखों के कोनों से हमें..
मुस्कुरा.. दे, बहुत धीमे
खिलती कली,  
दिल थाम कर,  
सौरभ भरी, महकती, 
और पुष्प हों कुछ, 
बिहंसते, झड़ चुके
खखाकर, हंसते हुए
ठूठे, प्रिये..! 
इस उम्र में, 
आओ चलें एक बार हम तुम
गलियों में उन।

जय प्रकाश मिश्र







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