यादें हैं कुछ, इस जिंदगी की


यादें हैं कुछ, इस जिंदगी की

चित्र.. सी, चिपकी.. हुई.. 

मिटतीं... नहीं, मानस.. पटल से.. 

क्या करूं, अच्छी हैं इतनी! 


इस लिए अब..

चाहता हूं पेंट कर दूं! 

शब्द की इन कूचियों से, 

ब्लॉग के, इस कैनवस पर

श्वेत..., श्यामल... रंग, में  ही...! 


रंग..., 

रंग... दूं?  

नहीं है रे..! रंग 'वे' अब...! 

क्या... कहा? 

उड़ रही, इन तितलियों से

खिल रहे इन पुष्प से, 

पंखुरी से, मोरनी से, मांग लूं! 

जी... नहीं, 

रंग वे, केमिकल नहीं.. हैं

फालतू....

भाग हैं, अंश हैं, इस प्रकृति के, 

नष्ट... कैसे, इन्हें... कर दूं।


इसलिए 

अब नहीं हैं, रंग.., 

मितवा! पास मेरे! 

उम्र जब थी, रंग की, 

तब भी कहां थे! 

रंग, ये.. भाग मेरे !

देख न, 

सादगी से, उम्र बीती.., 

बात करते, साथ रहते, 

साथ तेरे,  ही सजन.. रे! 


पर! स्मृति में आज भी, 

ताजे.. हैं वैसे.. 

अनछुए, मासूम, रेशे... 

हर एक, क्यों!  एक.. एक.. रे!  


यूरोप में, फ्रांस के पेरिस शहर में

सालों साल पहले, 

हे प्रिए! 

देखे... थे, जैसे.. साथ वे, 

किलोमीटरों में, फैले हुए, 

उस शाम को

शांति में, शाही महल की घेर में

विशालतम उस बाग में, 

'लक्जमबर्ग महल' के अन्यतम माहौल में।

आगे क्रमशः

जय प्रकाश मिश्र

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