एक.. उत्सव! काल..के संग..,
मित्रों, अवसान जीवन की एक अवश्यमेव घटना है। जीवन जिसके हम भाग हैं, अवसान के ठीक विपरीत छोर पर स्थित है। मृत्यु अवसान का लौकिक रूप है जो पूरे जीवन, चुप प्रतीक्षा करता है। इससे मुलाकात कैसी लगती है, आज इसी पर कुछ लाइने, आप पढ़ आनंद लें।
चाहता... हूं! देखना..,
तुमको... प्रिये!
नजदीक..
से..!
प्यार से...
और_.., थोड़ा, पास_.. से!
दूर.. मत हो, जानता... हूँ!
मृत्यु...! है, तूं...
तो, क्या...
हुआ ?
कोई.. नहीं, से
कम से कम, अच्छी है तूं!
क्या हुआ?
अरे!
यह, क्या... ?
नाराज है तूं...!
क्या? नहीं, मेरी.. है तूं!
अब, मेरी तो, संगिनि... है, तूं...,!
जानता हूं,
एक ही, मेरी... है, तूं..!
आ बैठ थोड़ा
पास, तुझसे... बात कर लूं।
बहुत दिन से, सोचता..हूं!
तुम पर, भी.. सोचूं!
तेरा विषय! भी,
जरूरी.. है।
भाग है
तूं
तुम पर, भी.. सोचूं!
तेरा विषय! भी,
जरूरी.. है।
भाग है
तूं
आखिर
मेरी.... ही
मृत्यु.... है तूं!
इस.. जिंदगी की,
इस.. जिंदगी की,
आखिरी! ख्वाइश भी मेरी!
तूं! अलग करती,
जिंदगी को..., जिंदगी से,
पर, जिन्दगी से, जिन्दगी में,
जुडी.. है, तूं....।
जिंदगी को..., जिंदगी से,
पर, जिन्दगी से, जिन्दगी में,
जुडी.. है, तूं....।
अवसान... है, तूं..
जिंदगी का..!
जन्म के, विपरीत.. है, तूं!
शायद...
जन्म के, विपरीत.. है, तूं!
शायद...
ये.. सच है,
बंधन, नहीं.. तूं!
शरीर..की, तो. मुक्ति.. है, तूं..।
शरीर..की, तो. मुक्ति.. है, तूं..।
पर....
एक.. उत्सव!
काल..के संग.., चेतना.. का,
री...!
मृत्यु है तूं... !
समय.. बंधन, चेतना पर,
अब नहीं है, मुक्त है वह...
इस बात का, सत्य ही, प्रमाण है तूं!
इसलिए..
हे....!
विजयिनी.....
इस विश्व.. की, काल.. की,
देह.. की, मस्तिष्क.. की,
कष्ट.. क्यों, दुख व्याधि.. की
संताप की, हर सोच की
दायित्व की, वेदना
अज्ञान की,
खुशी की और मृत्यु की..।
चाहता... हूं! देखना..,
तुमको... प्रिये!
नजदीक..
से..!
प्यार से...
और_.., थोड़ा पास_.. से!
मानता हूं,
इस जन्म का अवशेष होगा
सूक्ष्म होगा, शेष होगा
जो कुछ भी होगा
यदि
बचा होगा!
कर्म का प्रारब्ध! वह
क्रियमाण!
होगा
मन भी होगा, पढ़ा.. है,
सूक्ष्म होगा, शेष होगा
जो कुछ भी होगा
यदि
बचा होगा!
कर्म का प्रारब्ध! वह
क्रियमाण!
होगा
मन भी होगा, पढ़ा.. है,
कुछ पुस्तकों में,
मृत्यु के भी बाद प्रिय!
यह.. घूमता है
भरमता...
है,
इस जहां... में,
खोजता है, कारण लिए,
मृत्यु के भी बाद प्रिय!
यह.. घूमता है
भरमता...
है,
इस जहां... में,
खोजता है, कारण लिए,
सर पे अपने
स्थान कोई, ठौर कोई, माता पिता
यह....
यह....
इसी, जग में
अपने लिए ही अकेले!
अपने लिए ही अकेले!
कहीं कुछ नियम तो होगा?
अनुसार उसके,
पुनर्नवा...
मेरा... कही ...
कोई...,
तन तो होगा?
इस लिए, फिर नया जीवन भी होगा।
इस लिए, फिर नया जीवन भी होगा।
इसलिए तो पूछता हूँ
मृत्यु, क्या यह,
मृत्यु, क्या यह,
जरूरी है!
मृत्यु क्या यह जरूरी है!
हां मृत्यु भी यह जरूरी है!
हां मृत्यु भी यह जरूरी है।
मृत्यु क्या यह जरूरी है!
हां मृत्यु भी यह जरूरी है!
हां मृत्यु भी यह जरूरी है।
जय प्रकाश मिश्र
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