एक उधेड़ बुन, कहीं चल रही है,
मित्रों, जीवन संक्षिप्त ही है, और मध्यम मार्ग, बीच का रास्ता, जीवन जीने के लिए मेरे अनुसार सर्वश्रेष्ठ है। यहां शांति, संतोष और स्थायित्व है, जीवन अपना आप जीते हैं, धूप, वर्षा, प्राकृतिक हवा में स्वस्थ रह जीवन गुजरते हैं। इसी पे आज की लाइने आप पढ़ें, आनंद! लें।
एक उधेड़ बुन,
मन.. में
कहीं,
है,
चल रही,
किताब.., मेरी...
बहुत मोटी....अभी बाकी
मन.. में
कहीं,
है,
चल रही,
किताब.., मेरी...
बहुत मोटी....अभी बाकी
ख़तम, ही.... होगी, नहीं...।
सोचता.. था.
भ्रम.. था मुझे, किससे... कहूं!
पर, देखता... हूँ!
अचानक!
आजकल इन्ह किताबों को,
बंद होते,
कभी भी, कुछ ही क्षणों.. में,
किसी भी, जगह.. ही!
यद्यपि, सामान्य थे,
ये सभी भी...
देखने में
हे मित्र वे! मेरी तरह ही !
किताब!
तो है, बहुत ऊपर..!
टांड़ पर!
मिलती.... नहीं, की.., देख लूं!
पर, लग.. रहा,
पूरी ये होगी.., जल्द ही।
बहुत कम, पन्ने बचे हैं,
जानता हूँ!
दिनों के, कुछ
पर क्या कहूं!
दिलों के, ही बीच में,
कड़े,
कुछ... कंकड़, फंसे.. हैं!
देखने में
हे मित्र वे! मेरी तरह ही !
किताब!
तो है, बहुत ऊपर..!
टांड़ पर!
मिलती.... नहीं, की.., देख लूं!
पर, लग.. रहा,
पूरी ये होगी.., जल्द ही।
बहुत कम, पन्ने बचे हैं,
जानता हूँ!
दिनों के, कुछ
पर क्या कहूं!
दिलों के, ही बीच में,
कड़े,
कुछ... कंकड़, फंसे.. हैं!
आज तक,
इन्हें पा रहा हूं..!
चाहता हूं, इन सभी को
इन्हें पा रहा हूं..!
चाहता हूं, इन सभी को
जिंदगी से दूर कर लूं!
इसलिए अब सोचता हूँ!
साफ कह दूं!
इतना बड़ा... जग!
दूर... होगा, हाथ... से
हाथ... भी, अब दूर होगा..,
हाथ... से,
खुद.. से, मै..भी, अलग... हूंगा,
कुछ ही दिनों में,
मित्र हे! देखते ही देखते!
क्यों कहूं अंजान हूँ!
आज से ना, शुरू से.. ही
इसलिए अब चाहता हूँ!
बहुत जल्दी,
समराइज ही क्यूं, कॉन्क्लूड कर लूं!
क्यों छुपाऊं! क्यों दुराऊँ!
बात सब, बेबाक कर लूं।
बैठ लूं! अब चाहता हूँ!
शांति से,
साथ अपने...
शेष.... जो, दिन अब बचे हैं,
परीक्षित सा,
विष्णु का मैं ध्यान कर लूं!
घूम लूं, कुछ तीर्थ सुंदर
संत कोई! हो कहीं तो, उससे मिल लू।
जिंदगी का सबक सारा
याद कर लूं, चाहता... हूं
मित्र.. हे!
तुमसे भी कह दूं!
सच है ये, पैदा हुआ था
झिल्लियों में बंद!
मैं,
बिन..
स्वांस के,
ठीक वैसे जाऊंगा, भी..
बंद होकर ..... में, बिन स्वांस के..!
इसलिए, यह खेल सारा
स्वांस का था,
मित्र मेरे!
कैसे बचाता स्वांस को
इस, कठिन था
इसलिए अब सोचता हूँ!
साफ कह दूं!
इतना बड़ा... जग!
दूर... होगा, हाथ... से
हाथ... भी, अब दूर होगा..,
हाथ... से,
खुद.. से, मै..भी, अलग... हूंगा,
कुछ ही दिनों में,
मित्र हे! देखते ही देखते!
क्यों कहूं अंजान हूँ!
आज से ना, शुरू से.. ही
इसलिए अब चाहता हूँ!
बहुत जल्दी,
समराइज ही क्यूं, कॉन्क्लूड कर लूं!
क्यों छुपाऊं! क्यों दुराऊँ!
बात सब, बेबाक कर लूं।
बैठ लूं! अब चाहता हूँ!
शांति से,
साथ अपने...
शेष.... जो, दिन अब बचे हैं,
परीक्षित सा,
विष्णु का मैं ध्यान कर लूं!
घूम लूं, कुछ तीर्थ सुंदर
संत कोई! हो कहीं तो, उससे मिल लू।
जिंदगी का सबक सारा
याद कर लूं, चाहता... हूं
मित्र.. हे!
तुमसे भी कह दूं!
सच है ये, पैदा हुआ था
झिल्लियों में बंद!
मैं,
बिन..
स्वांस के,
ठीक वैसे जाऊंगा, भी..
बंद होकर ..... में, बिन स्वांस के..!
इसलिए, यह खेल सारा
स्वांस का था,
मित्र मेरे!
कैसे बचाता स्वांस को
इस, कठिन था
पर...
रास्ता.. था,
जानता... था,
यदि सजग होता शुरू से!
शांति से, संयम लिए,
यदि सजग होता शुरू से!
शांति से, संयम लिए,
हे मित्र! मै आनंद से, जीवन ये जीत।
मार्ग मध्यम, सम है जो!
मैं.. उसे.. चुनता!
सौहार्द्र से जीवन ये.. जीता
बहुत लंबा....।
यही तो वह कथा है
सौहार्द्र से जीवन ये.. जीता
बहुत लंबा....।
यही तो वह कथा है
इस स्वांस की
अनुपम नहीं, दुर्लभ.. है ये...!
अनुपम नहीं, दुर्लभ.. है ये...!
एक उधेड़ बुन, मन.. में
कहीं है, चल रही,
किताब.., मेरी... बहुत मोटी....
ख़तम, ही.... होगी, नहीं...,
भ्रम.. था मुझे, किससे... कहूं!
पर, देखता... हूँ!
अचानक!
इन्ह किताबों को, बंद होते,
किताबों को, बंद होते ।
जय प्रकाश मिश्र
जय प्रकाश मिश्र
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