हो कहां? तुम, आजकल! दिखती नहीं हो....
मित्रों, अपनी हर उम्र में 'एक-हम' अपने साथ सदा बने रहते हैं, और तद समय के सभी अच्छे बुरे अनुभव स्मृति में समाये जाते हैं। यह स्मृति, स्फुरित हो अन्यान्य स्फ़ुरण, अंतिम दिनों में, हमें वापस देती हैं। इसी पर एक सुरथ-विरथिनी आप के आनंददार्थ, आप पढ़ें, खुश होंगे ही।
हो कहां? तुम, आजकल!
दिखती, नहीं हो..?
साल, सत्तर..
हैं,
बिताए
साथ... तेरे,
री... जिंदगी! और,
पूछती है, आज! मेरा..., पता...,
मुझसे..
इस तरह से...
जानती ही है नहीं तूं, अरी मुझको!
कैसी.. है
तूं...?
आ.., मिल.. गले,
एक बार, फिर... से,
उस.. तरह!
बार, पहली..! मिली.. थी
कांटों में सूखी..,
चुभती हुई.. पेट.. भूखे !
कितनी, रसीली..!
अहा! तब तूं लगी थी,
मुझे याद है, अच्छी तरह से
हे, तरंगिनि..! हे तरंगी!
हे प्रियि! अहे।
गिन..!
तो.. दिन..!
कितने... हुए !
सोच.. तो, तुझसे.. मिले!
तब रेख.. थी,
रे...
स्याह, सी..
चेहरे... पे, मेरे..।
और तूं...! आजाद... थी!
संग मेरे...
घूमती.. थी, किस.. तरह!
इन खेत में, सीवान में, खलिहान में
बिल्कुल अकेले!
क्या, वो.., दिन थे!
कैसी बरसती!
अर..!अरर..अररी!
अरर..राई!
हो रही, बरसात में...
साथ, हम तुम,
रसाते
पियु ! भीगते..थे।
कड़कड़ाती ठंड में,
रात्रि के, अंतिम... प्रहर में,
मूंगफलियां...
खा रहे, हम साथ थे,
घूमते थे ! भोर के पहले चरण में।
निडर थे हम, अरे! कितने..
किसी को तब,
अंगुलियों पर
हम कहां थे, गी..नते ।
कहां है, तूं आज कल!
तुझे खोजता हूँ
पूछता हूँ, पता तेरा...
हर किसी से, पागलों।।। सा
इन नन्ही नन्ही, उड़ रही
लान में, बैठी हुई,
अतिथियों सी,
चट-पटाका फटका चिडी से।
जिंदगी हे! अरी इन!
निर्जन! दिनों में।
कैसे कहूं
अरी
तुमसे..., समझ तो
इन अंतिम दिनों में।
कभी तो आ..
मिल..
अकेले..,
देखता हूँ राह तेरी...
बंद इन, शयन कक्षों में लगी,
पारदर्शी खिड़कियों से।
उठ नहीं पाता हूँ अब इन
बिस्तरों से
पर..
चाहता हूँ
देखना, मिलना तुम्ही.. से,
इस.. उम्र में, भी,
पर उस तरह से नहीं
अब, री!
सादगी ले, होठ पे.
सूखे हुए, ना रहे अब रसीले!
संग...
लंगड-खाते, इन पदों पे..!
क्या!
फुदकती है ?
आज भी तूं!
उस ही तरह! ही..
बेधड़क!
रिया!
दिखा ना एक बार!
तन से, न! सही,
मन से, सही...,
फुदक लूं, साथ तेरे, एक बार फिर से।
जय प्रकाश मिश्र
..........
पग दो
तुम मूक.. होते, और कहते
तो भी सुनता,
तुम्हारे साथ केवल तुम नहीं
परिवेश क्यों, वातावरण
है, बोलता..
कौन... हो स्तब्ध!
किसको
समय.. है !
क्यों.. हमें देखे?
तुम जहां हो, नीचे, वहां से
नहीं दिखता...
वह रौशनी का छिद्र
पहले ही
किसी ने बनाया था,
क्या इसलिए
कोई आएगा, मेरे मौन में
मूक ऐसा, गीत ऐसा, मौन का,
वह गाएगा, मुझे देखकर
ये गीत मेरा!
जय प्रकाश मिश्र
Comments
Post a Comment