सोचता हूं, लिख.. ही दूं!
मित्रों, जीवन में कभी कभी, कोई एक., कहीं.., ऐसा अनजाने ही अकस्मात मिल, अनचाहे मन हृदय पर ऐसे छप जाता है कि छूटता ही नहीं, इसके आगे के लिए आप ये लाइने पढ़ें और आनंदित हों।
सोचता हूं, लिख.. ही दूं!
अब..! राज, तेरा..
कशम-कश,
कब..
तक रखूं!
आखिर! वो.. क्या है?
अलग... तुझमें,
हर..
किसी से,
इस.. तरह,
ऐ..! अजनबी!
प्रियतर है, तूं..!
तूं! खींच.. लेता,
चित, मेरा..!
जल,
ढलानों पर,
बह रहा हो, सहज ही,
सानिध्य.. देता..
छम छम छमाछम
बरसती..
मृदु, मधुर, बौछार सा!
इस तरह क्यूं ?
भीग जाता.. हूँ, अरे! मैं..
अंतरों तक, पोर तक
और गहरे..
हृदय
तक
उमंगता हूं! क्या... कहूं!
दूर.. से, इतने अरे!
तुझे सोचने.. से,
सब..
क्या लिखूं! और क्यों.. लिखूं!
तूं.. गजब है!
रस, अजब.. है!
चुम्बकों सा, फेर लेता
मन मेरा!
ओर अपनी..
अचानक! से एकदम!
'लिरिल के स्प्लास सा'
अनुभूतता...
मैं,
बिल्कुल.. ही, फ्रेश.. हूँ!
एक क्षण में,
सोच तुमको...
इसलिए तो पूछता हूँ!
बता ना!
मेरा...
कौन है तूं!
सच!
कह रहा हूँ,
कैसे भी हूँ! चाहे जहां हूँ,
विपत्ती, दुख और पीड़ा बीच भी हूँ,
मुफलिसी, शैय्या पड़ा हूँ!
हर हाल में..
मेरे लिए..
'बिमल' की सी, ताज़गी
तूं...!
इसलिए तो पूछता हूं
अरे!
क्या, वह... कलयुगी,
अमृत.. है, तूं...!
चल! इस लिए,
अब
आज तुझसे पूछता हूँ
पूरा, खुल के...
सच बता दे कौन है तूं?
कितनी पुरानी
स्मृति!
तूं
एक क्षण की मुस्कुराई!
दिल पे छाई!
किस तरह थी, पास आई!
छप... गई है,
आज तक...
धूमिल.
नहीं...।
आज भी, वैसी ही है
उस जगह ही!
उस तरह ही!
हे प्रिये! उसी रूप में चस्पा है तूं।
जय प्रकाश मिश्र
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