चलती हुई एक घड़ी थी, जो रुक गईं

मित्रों, जीवन के अवसान को, और जिंदगी के शान को मैने नजदीक से देखा है उसका एक चित्र आप के लिए लिख भेज रहा हूं।

चलती हुई एक घड़ी थी, 
पुरानी, 
मुझसे बड़ी थी
इतने दिनों.. से, 
साथ.. मेरे..
चलते.. चलते..
देखते.. ही, देखते..
सहज से, असहज.. हुई,
अंदर, कहीं, और क्या कहूं!  
बिल्कुल अचानक, 
एक क्षण में
एक दिन, वह रुक गई।

उससे पहले....
ऐ! 
जिंदगी! 
देखा... तुझे ! 
नजदीक.. से, 
पर देख तुझको, 
सच है ये!  
मैं 
डर गया..!

क्या... खोजती तूं! 
फिर.. रही थी, 
हाथ.. बांधे, 
कक्कन.. बनाए,
उंगलियों को फंसाए, 
एक दूसरे में, 
एक... संग, देर.. से
उन अंधेरों में, बिल्कुल अकेले... 
जिस तरह! 
देख!  
तुझको सच है ये, मै डर गया।

स्पर्श!  
कैसे.. कर रही थी!  
बिस्तरों को, 
फूल.. हों बिखरे पड़े..
हर ओर उसके! नर्मोमुलायम! 
सलवटों को छू रही थी! 
किस तरह तूं!  हल्के.. हल्के.., 
किस लिए? 
लकड़ियों से सूख कर!  
पतले हुए,
तुम!  
हाथ से प्रिय! अरे कैसे
हृदय मेरा, 
देख कर यह हिल... रहा! 
ऐ जिंदगी...!
नजदीक से, देखा तुझे तो डर लगा...!

इतना बड़ा दिन! 
इतनी बड़ी ये रात काली! 
कैसे बिताती हो, प्रिये 
बिना बोले शब्द एक! 
तुम कौन हो?  
इतनी सहज लेटी हुई! 
एक करवट रात सारी!  
कूल्हे की तेरी 
इन हड्डियों पर हो गए, इन घाव को
प्रिय सच सुनो मैं देख कर 
अब डर रहा! 

उंगलियां लंबी हुईं हैं सूखकर, 
या लंबी ही थीं, 
पहले प्रिये! भ्रम है मुझे, 
ये रूप तेरा, इस तरह 
गड्ढा... हुआ, है हर.. जगह, 
उभरा हुआ है
मात्र!  
प्रिय, इन अस्थियों पर! 
टंग रहा, है किस तरह..
यह चर्म पतला, 
घिस चुके किसी फैब्रिक सा
देख कर मैं डर गया! 

धंस चुके 
ये नयन तेरे, कोवको में, 
नाक उभरी.., कागजों... सी 
पतली... हुई,  इन,
भित्तियों 
से
निकलती 
वेग से इस स्वांस को
कहीं फंस रही, है रास्ते में 
देख कर मैं डर गया।

खोजता हूँ, कहां है वह पेट! 
प्रिय, जिसको... लिए 
तुम!  
भटके.. सारा देश... 
वह अब कहां है! 
गायब हुआ, सट चुकी हैं
पज़रियाॅ, पीठ से
सूखी हुई ये इंद्रियां! 
आनंद.. की, 
सब देख कर मुझे डर लगा।
 
अब कहां है धर्म तेरा?  
अब कहां पाखंड तेरा? 
अब कहा वह शुद्धता !  
अब कहां अभिमान तेरा? 
मान तेरा! 
वह जादुई, सिसकारती 
आवाज तेरी? 
कुछ नहीं...
रस माधुरी में, 
अब सनी  बेचारगी! 
है, दर्द मीठा!  
साथ ले कोई टीसती! आवाज हल्की
सुबह के पहले चरण में
तैरती 
मलयानिली उस
मलय गिरि की घाटियों से
आ रही 
सिसकार.. अब जो 
शब्द भरती, कर रही, 
काटती है वक्ष! मेरा, 
सिल्क से भी और पतले सूत सा ! 
तुझे देख कर! 
ऐ जिंदगी मुझे डर लगा।

चुप पड़ी, 
फिर..
आह.. भरती, 
शब्द से बे शब्द बनती.., 
हे जिंदगी! 
रात दिन के बंधनों से 
दूर अब तूं! समय से उस पार होती
कर्म सारे शेष कर, 
शैशव हुई फिर! 
ऐ जिंदगी...
नर्मो मुलायम बाल तेरे! 
शशक शावक से भी अच्छे!  
फूस हो कोई, 
मखमली!  
मेरे हाथ छू कर चूमती! 
स्पर्श तेरे शीर्ष का, 
मुझे कुछ ऐसा लगा।

ऐ जिन्दगी देख कर इस हाल में
तुझको प्रिये 
मैं 
डर गया।

जय प्रकाश मिश्र




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