दुधमुंहा.. बच्चा कोई, हो.. हंस... रहा,

कुछ, जगा.. देता है, 

वो.. मुझमें..

बस..., 

देखने.. से, 

रंग छोड़ो, रूप छोड़ो, 

सच कहूं! मूंदे..., नयन से।


प्यार...! 

प्यार, कैसे उमड़ आता,

अंतरों.. में, 

संग उसके, सच कहूं! 

देखा! प्रिये.. नवजात.. शिशु.. 

सुंदर! सलोने! सो.. रहे, 

को।


जताता है, प्रेम कैसे! 

एक.. क्षण में, 

बांधता.. है, 

डोर... 

में,

दुधमुंहा.. बच्चा हो

कोई, .. हंस... रहा, 

बिस्तर के ऊपर, 

सोते हुए.. सुंदर सपन में। 


देखा कभी है! बता न! 

अरे! यही है वह

पराविद्या.., 

बिन छुए, बिना बोले

बिन... सुने, यह.. व्यापती है, 

नस नाड़ियों में, 

प्रफुल्लित..., करती  प्रिये।


शब्द 

क्या.. है, 

वह, क्या.. जाने...?

अर्थ क्या है, वह क्या.. जाने? 

जो 

जानता.. 

खुद को नहीं है

पराविद्या, निधि.. उसी की, 

रे... प्रिये! 


हम 

ये जानें, 

रंग, क्या.. है, 

रूप.. क्या है, गंध.. क्या है! 

मिट्टियों से बन रही, 

मानवी, इन 

मूर्तियों 

का 

ढंग क्या है!  

अतीन्द्रिय और पराविद्या 

इससे ऊपर... 

जानती है, हे प्रिये! 

आनंद 

क्या 

है।


किसी साधु का, सिद्ध का 

मात्र..! 

पग..., देखा कभी है, 

आजतक...

विरज, रज से दूर है वह! 

शांति है, स्प्लाश जल का

एक छींटा प्रेम का, 

भीगाता वह, उर तुम्हारा! 

भिगाता वह, उर तुम्हारा! 

जय प्रकाश मिश्र








कुछ, जगा.. देता है, 
वो.. मुझमें..
बस..., 
देखने.. से, 
रंग छोड़ो, रूप छोड़ो, 
सच कहूं! मूंदे..., नयन से।


प्यार...! 
प्यार, कैसे उमड़ आता,
अंतरों.. में, 
संग उसके, सच कहूं! 
देखा! प्रिये.. नवजात.. शिशु.. 
सुंदर! सलोने! सो.. रहे, 
को।


जताता है, प्रेम कैसे! 
एक.. क्षण में, 
बांधता.. है, 
डोर... 
में,
दुधमुंहा.. बच्चा हो
कोई, .. हंस... रहा, 
बिस्तर के ऊपर, 
सोते हुए.. सुंदर सपन में। 


देखा कभी है! बता न! 
अरे! यही है वह
पराविद्या.., 
बिन छुए, बिना बोले
बिन... सुने, यह.. व्यापती है, 
नस नाड़ियों में, 
प्रफुल्लित..., करती प्रिये।


शब्द 
क्या.. है, 
वह, क्या.. जाने...?
अर्थ क्या है, वह क्या.. जाने? 
जो 
जानता.. 
खुद को नहीं है
पराविद्या, निधि.. उसी की, 
रे... प्रिये! 


हम 
ये जानें, 
रंग, क्या.. है, 
रूप.. क्या है, गंध.. क्या है! 
मिट्टियों से बन रही, 
मानवी, इन 
मूर्तियों 
का 
ढंग क्या है!  
अतीन्द्रिय और पराविद्या 
इससे ऊपर... 
जानती है, हे प्रिये! 
आनंद 
क्या 
है।


किसी साधु का, सिद्ध का 
मात्र..! 
पग..., देखा कभी है, 
आजतक...
विरज, रज से दूर है वह! 

शांति है, स्प्लाश जल का
एक छींटा प्रेम का, 
भीगाता वह, उर तुम्हारा! 
भिगाता वह, उर तुम्हारा! 
जय प्रकाश मिश्र















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