निःशब्द को पढ़ना तो सीखो,

बहना..., तो सीखो, 
चाहते हो, 
अगर.. 
तुम..,  शीतल.. रहो!
नदी.. देखो, हवा देखो, 
पानी.. जहां हो,
वहां.. देखो..
वाष्प.. 
बन कर, बह.. रहा, वह
तभी.. तो, 
सुखकर!  है.. वो..।


'देना'.. तो, सीखो! 
चाहते... हो. 
अगर, 
तुम, निर्धन.. न हो !
वृक्ष देखो, 
संत! देखो
देवता का दर्श लो, 
देते सभी 
दिल खोलकर
तभी तो पूजित हैं वो।

निःशब्द को पढ़ना तो सीखो, 
चाहते... हो 
अगर..
तुम, 
इस.. नियति के साथी बनो
प्रेमी को देखो, 
करुणामयी माता को देखो
गाय संग बछड़े को देखो,
तभी तो, स्तंभ है ये संस्कृति के।

हे प्रिय मेरे,
अबोली भाषा को सीखो
हृदय की भाषा को सीखो
चाहते हो
अगर
तुम, आनंद नद में तैरना।
इसके लिए तुम, कम से कम
प्रेम की भाषा तो सीखो।

जय प्रकाश मिश्र 


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