देखा.., क्षणिक..! और प्रफुल्लित..!
मित्रों, नित्यता अपने गुणों के साथ सदा सबके भीतर रहती है। यह बिना कारण कैसे हमारे भीतर होती है इसी पर कुछ लाइने आपके आनन्दार्थ।
एक फूल खिलता..,
देखकर...
अंजान.. घर में..
जंगलों.. में...
मतलब नहीं, जिससे तुम्हे!
देखा..,
अंजान.. घर में..
जंगलों.. में...
मतलब नहीं, जिससे तुम्हे!
देखा..,
क्षणिक..!
और हो.., प्रफुल्लित..!
और हो.., प्रफुल्लित..!
इतनी.... प्रिये!
बता.. न! क्या... है, ये...
यह नित्यता है, प्रेम.. की
समझ न!
प्रगट होती, स्वतः ही..
हर हृदय.. में।
यह..
प्रेम... है
फूटता.. है, हर किसी में,
अंदर कहीं से...,
देख न!
यह प्रेम..., बहता
यह प्रेम..., बहता
जब प्रिये!
तुम्हे बांध लेता, रज्जुओ में,
ठीक वैसे,
निष्कलुश हों नेत्र.. शिशु के..
बांध लेते साथ अपने..!
कारण नहीं!
तुम.. देख इनको,
खुश न हो !
देखकर, हर्षित न हो!
सुंदर प्रिये!
सुंदर प्रिये!
यह, प्रेम... है!
आंखे.. नहीं..
शिशु की, अरे!
कभी सोच तो, यह क्यों प्रिये..?
कभी सोच तो, यह क्यों प्रिये..?
मन ललचता है,
अरे! क्यों?
उसे, देख कर!
प्रसन्नता क्यों घेर लेती
प्रसन्नता क्यों घेर लेती
है, हमें..!
बिन बात के!
बिन बात के!
अरे! यही तो, वह..
निर्झरा.... है,
कारण रहित, जो नित्यता.. है,
समझ इसको! अगर आये समझ.. में!
कारण रहित, जो सदा हो..
प्रेम सा, सत्य सा, स्नेह सा,
दायित्व सा..
समझ...फिर से..
जब...
उठा.. लो!
तुम.. भागता..!
शिशु! सड़क से..
असुरक्षित... प्रिय..
किसी का.., बिना पूछे..
पुचकारते हो,
प्यार
से,
दायित्व समझे, मित्र अपना
बिना सोचे, बिना समझे...
यही तो वह नित्य सारे गुण प्रिये!
जो, हममें रहते, नित प्रिये
इस प्रेम से, इस प्रेम में,
नित्य हैं ये।
जय प्रकाश मिश्र
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