रोज सजती, नव-पुष्प से दुनियां... नई।
टूट... जाएगी..,
तेरी...
माला, ये एक... दिन..!
बिखर.. जाएंगे,
ये...
मन... के,
मनके... सभी..., सुंदर...!
यहीं...।
पंखुरी..
सारी.., नवेली..
मुरझ कर, राग.. खोकर
सज़ीले.. गजरा से इस...!
इन्ह, पुष्प... से, मुंह, मोड़कर!
झर....!
अलग होंगीं,
अरे, ये..
देखते ही देखते.., प्रिय, शीघ्र.. ही!
खुशबू..! यहीं..,
इसकी..,
प्रिये..
यह.. गुदगुदाती.. महकती
अंग.., संग... बसी,
छोड़.. इसको,
वायु..के संग अलग होंगी,
बाहर..! निकल,
फिर न... मिलेगी..
आह! प्रिय.., इसको.. कभी!
इस लिए, सुन!
हम.. तुम.. भी ऐसे..,
ही.. प्रिये!
दुनियां... में इस!
चुप, छुप, कहीं.. आ..
अकेले में
यादें... संजों, के रख, प्रिये!
कल, के.. लिए..
स्थिर नहीं जग, दुनियां ये अपनी...
कुछ नहीं, बस एक क्षण का...,
साथ सबका,
नटिन है,
यह नाचती, बदलती
देख न...!
रोज सजती, पुष्प से
दुनियां... नई।
चंचल..
है,
चिड़िया.. देख कितनी..!
फुदकती.., जीवन हो कहती...
धूप.. अच्छी है, शरद की,
लेकिन प्रिये, यह देर... कितनी!
मुंडेरों.. पर,
कभी, टिकती..!
इस लिए यादों को इन...
संजों कर, तूं.. रख प्रिये!
दुनियां, ये अपनी...
कुछ है ही, ऐसी..।
सुख.. है,
ये!
अपनी गृहस्थी.. ,
बच्चों की, बातें बहुत मीठी
बच्चियां.. कितनी. हैं., अच्छी है,
लेकिन सभी ये छोड़
एक दिन!
नौकरी पर, पिया.. के घर कैसे चलतीं...
इसलिए..
यादें... संजों, के रख, प्रिये!
कल, के.. लिए..
स्थिर नहीं जग, दुनियां ये अपनी...।
जय प्रकाश मिश्र
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