एक डर थी जिंदगी,

मित्रों जीवन खुश रहने के लिए मिला था लेकिन बेफजूल दुश्चिंताएं आदतन हमें घेरे रहती हैं। इसी पर कुछ एक रसरंजिका आपके सुपुर्द करता हूँ।

एक डर थी जिंदगी, 
कितने.... डरों से 
यह घिरी...!
आज... 
का, 
कुछ.. वास्तविक,
कुछ.... कल्पना का, मानसिक।

क्या कहूं, देखता.., हूं !
उम्र में, इस..., 
स्वप्न... 
में, भी
जब घूमता बेफिक्र होकर.. ,
अलमस्त मैं., बिल्कुल अनर्गल!  
तब ही अचानक !  
सत्य से भी 
और 
ज्यादा, अहा चिंतित! 
हो.... रहा हूँ, 
देख कर परीक्षा तो, 
पास है...
कुछ नहीं तैयार है, 
मैं फेल हूँ ।

डर रहा, कुढ़ रहा, 
पछता रहा, 
रूआंसा मैं, हो गया हूं। 

कुछ कमा लूं,
बचा लूं,
खरीद लूं, संचय मैं कर लूं! 
नाम कर लूं 
संपत्ति कोई बहुत सुंदर, 
कामधेनु खोज मैं 
घर में ही
रख 
लूं।
 
नित्य, कुछ मिलता रहे,
मासिक.. मिले,
साप्ताहिक भी मिले...
वार्षिक तो न्यूनतम मैं चाहता हूँ! 
अभी... कम है, 
उनकी अपेक्षा, बहुत... कम है
क्या है ये...., बढ़ती.... हुई 
दरवृद्धि... आगे !
कुछ नहीं है!
चिंतित हूँ,  मैं, 
यद्यपि.... 
टैक्स इनकम भर रहा हूँ।

लटका हुआ अब 
त्रिशंकु हूँ,
मित्र सारे जा चुके...
उसपार... 
नित ही, देखता, सुन रहा हूँ,
आम पीला हो चुका हूं!
टपक जाऊं, किसी भी, क्षण 
जानता... हूँ, 
चाहता... हूँ! 
पर.... दुखी हूँ! 
इसलिए तो कह रहा हूँ.....
एक डर थी जिंदगी, 
कितने.... डरों से 
यह घिरी...
आज... 
का, 
कुछ.. वास्तविक,
कल कल्पना का, मानसिक।

सांसारिक दौड़ में, पीछे हूँ मैं
घुड़दौड़ की इस दौड़ से
बाहर हूं मैं..
उम्र मेरी हो चुकी है
साथिन, अकेली
हो चुकी, है 
छोड़
मुझको, बिस्तरों पर 
वह पड़ी... है
पर, क्या करूं! 
कैसे बनाऊं, जिंदगी को 
और बेहतर! समृद्धतर
लगा हूँ, 
मैं सगा हूँ! 
उन सभी का
दूर जिनसे हो चुका हूँ,
स्वार्थ में, संपत्ति में,: इगो के चलते
ठगा हूँ, सब जानता हूँ।
पर दुखी हूं,
चार दिन की जिंदगी में
मैं खुश नहीं, दुनियां को लेकर
व्यथित हूँ, 
इसलिए तो कह रहा.....
एक डर थी 
जिंदगी, 
कितने.... डरों से 
यह घिरी...
आज... 
की 
कुछ.. वास्तविक,
कुछ.... कल्पना सी, काल्पनिक।

जय प्रकाश मिश्र







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