अतीन्द्रिय वह!

मित्रों, विश्राम लेकर पढ़ें, और पढ़कर ही नहीं डूब कर आनंद लें। 
 
हे, अतीन्द्रिय!  
साथ मे, 
सब.. 
रख चलेंगे, 
विश्व को इस.. कुछ न देंगे! 
पग..! आखिरी! 
मूक रह कर, ही रखेंगे! 
अहर्ता!  अहंता! अर्हत..!  अरे.. हे! 
मर्त्य हम! अमृत से उस..
सिद्ध है जो आपको..
क्या.. सदा, वंचित.. रहेंगे।

आंखे... सभी के पास थीं
उस पर न..!  थीं, 
सबने कहा..
दृष्टि.. से! 
बंचित 
रहा 
वह 
उम्र भर..!  
पर, वहीं.. अंधे 
सभी... थे, ज्ञान से, 
मात्र उसके
चक्षु थे
प्रिय! 
सत्य अंतर्दृष्टि के..
वरदान हैं ये, सबने.. कहा... 
चक्षु तो दोनों ही थे, दृष्टि.. के हों, 
अन्यथा हों, ज्ञान.. के
बता न? वह वंचित रहा उम्र भर
या धन्य..प्रद! 
क्या? 
विपर्यय ही विश्व का आधार यहां! 

आंखे हैं जब तक
तभी.. तक
जग.. है, प्रिये..! 
प्रकाश भी आभा लिए...
अन्यथा.., 
रूप.. यह, दृश्य.. यह,
सौंदर्य.. यह, 
और तुम प्रिये! 
कुछ... भी नहीं..! 
आभास बस, स्पर्श तक।।
सीमित यहां सब हैं प्रिये, 
बस.. इंद्रियों की आंख तक..।

आध्यात्मिक, 
भी, 
आंख.. होती है, प्रिये!  
इन, आंख.. सी ही
जिनकी खुली.., 
उनके लिए जग, अलग.. है..! 

अतीन्द्रिय.. का 
राज्य, प्रिय.. 
सुख, शांति, क्या?
उसके लिए तो पहुंच है, 
संतुष्टि के आगार तक! 

रूप है, जग में प्रिये! 
प्रकाश.. है
दृग, तुम्हारे पास है,
तभी तक!
सौंदर्य.. , सुख!  यह.. 
अन्यथा 
यह..., 
कुछ नहीं, 
पूर्णतः बेकार है।

यह विश्व क्या.. एक प्रदर्शन है! 
आकार में छुपे.. 
रूप का, 
रंग का, सौंदर्य का.. बाजार है।

चमचमाहट, कांति बिकती है यहां...
सच प्रिये 
जग यह, 
दृष्टि.. का व्यापार है। 

श्रापित.. हैं, हम.., 
सीमित यहां..
बस, इंद्रियों... तक, 
अपने लिए जग..! 
अतीन्द्रिय सुख अलग है।

उसके लिए प्रिय! 
नग्न है सब..
पारदर्शी.., 
काल की इस यवनिका से 
दूर.. है, वह..।

गजब हैं ये इंद्रियां 
प्रिय! 
प्रवंचना से भरी है, छली हैं,
आदतों का एक पर्दा ओढ़ती हैं
अपने ऊपर, 
आभास देतीं, सतह का, 
अंतर कहां यह, देखती... हैं।

आलिप्त रहतीं वासना से, 
लालची.. हैं
रूप.. की, 
रंग.. की, 
रस.. खोजती हैं
सत्य निर्मल, 
प्रिय...
कहां यह देखती हैं।

अतीन्द्रिय की 
दृष्टि इससे अलग है,
लौकिक नहीं, 
अलौकिक वह देखती हैं,
राग से, 
प्रपंचों से दूर वह, 
सत्य निर्मल देखती है।

जय प्रकाश मिश्र



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