बता न! क्या, जग.. यही है?
मित्रों, यह हमारा सम्पूर्ण संसार उस महाचक्र का मात्र एक क्षुद्र अंश है, नियति का खेल निराला, और हमारी कल्पना से पार है इसी पर आपके आनन्दार्थ यह रूपक गीतिका प्रस्तुत है।
हे,
प्रिये!
बता न!
क्या, जग..
यही इतना बड़ा!
सानिध्य तेरा, मधुर, अप्रतिम..!
सौंदर्य मेरा गुलाबी, हल्का सा रक्तिम!
खींचता..., मधुभरा.., नवयौवना!
साथ में, ये... शिशु, सलोने!
उजले उजले, चुलबुले..!
और यह,
परम सुख! सुंदर! अयन* का..!
सारी... प्रकृति, लेटी... हुई,
नाचती...!
दासी बनी, मेरे.. सामने!
और नाम अपना
गूंजता...
हर ओर प्रिय! क्या यही जग है?
या इतर! इससे...
कहीं... कुछ! और.. है
मैं, चाहती हूँ, जानना।
जग!
बड़ा है प्रिय!
इससे, बहुत.! जो दीखता है,
इस सृष्टि.. के भी, पार. है,
कुछ..! निरंजना!
वही तो, कारण प्रिये!
रुपहली,
जादू भरी, इस.. सृष्टि का।
वह,
परा.. है,
हे प्रिये! विषय ही न!
मानुषी, इन... इंद्रियों.. का।
हम.. तुम, प्रिये! सुख.. दुख.. लिए,
और यह, जीवन है, जितना...,
जगत सारा, प्रकृति सारी,
बादलों संग, बदलियां
रंगीन वृद्धा..,
भाग हैं, सूक्ष्म सा एक अंश हैं
उस परम सत्ता... "श्रीनियति" का।
भ्रमित!
हो... मत, कहां है! वह...
दूर.. है, तो.., दूर है....
तारों के जितना...!
पास है, तो पास है, तुम्हीं में!
निज, आत्मा सा ।
अरे!
वह... तो...
जुड़ा है, हर एक कण से...
हर समय..,
पर सूक्ष्म है वो, सोच से
ध्यान से, योग से उपासना से।
पर
प्रेम में,
वह प्रगट होता!
दीखता है, बहुत हल्का!
चक्षु में, हिलता हुआ
चमकता,
प्रिय.. आर्द्र सा।
करुणा भरा, स्नेह भर भर
ताकता...
उर में तुम्हारे, झांकता।
उर में तुम्हारे, झांकता।
इसलिए जग बड़ा है,
कल्पना की
भूमि से, तेरी सोच से, अतिशय बड़ा।
जय प्रकाश मिश्र
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