उस निर्मला! से क्या कहूं!

मित्रों, गीत जीवन को आह्लाद से भरता है यह आनंदित कर रसमय कर दे अपने रस से तभी गीत है। आप हर लाइन को आराम से समय देकर पढ़ेंगे तो आप एक जीवंत गीत इन लाइनों में शायद पाएंगे, ऐसा मेरा विश्वास है।

एक, तनु-अंगी ने पूछा, 

पास, आकर, 

"गीत..."  क्या.. है? 

क्या, कहूं...! 

स्मारिका सी, स्मरी*.. वह! 

गीत.. ही थी! 

हाय! 

प्रिय! इस, निर्मला..! से क्या कहूं! 

बहती रहो! 

अंदर.. 

कहीं, तुम.., 

छुल-छुल.. छुलुल-छुल! 

और 

छींटा...! ठंड का..

पड़ता, रहे, 

छुन-छुन.. छुनुन-छुन! 

"उर..." 

पर!  तुम्हारे.. 

साथ ही,  

आ.. रहा,  झर... रहा 

आनंद...! हो, 

मन में, तुम्हारे..

मन, 

सरसता.. कुछ, मचलता.. हो,

पढ़ते हुए, 

यदि.. 

मंजरी! कोई शब्द की

तो....

गीत.. है, वह

और क्या है, गीत यह..! 

रस माधुरी..!

 

शब्द सुन! मेरे प्रिये वह...

जाने न क्यों, 

एक क्षण को, मुस्कुराई... 

बहुत, धीमे...।

और फिर कुछ देर में, 

कनखियों से 

देखती..

खिलखिला... कर हंस.. पड़ी।


गीत था, सुनना उसे,

पर देख! उसका 

हाल, 

मितवा! 

प्रस्फुटित हो गीत, 

खुद ही.. लिख उठा

मन में मेरे, 

बिन बजे, संगीत अब भी, बज रहा।


एक सुंदर, गीत.. 

सी... 

सखी.. उसकी, थी.. खड़ी..

पास ही... में

आगे... बढ़ी.. और पूछ... बैठी? 

क्या! गीत की गरिमा है कुछ? 

तो.. अरी, सुन !  

जब.. 'फूल से' छू जाएं अक्षर...

कर्ण.. को

महक देकर विदा लें

पर छोड़ जाएं, असर अपना

रंग अपना, जीवनों पर, 

जीवनों को बदल दें, आनंद भर दें

क्षुद्र.. में भी, 

हे सखी! 

गरिमा यही है, गीत की...।

गरिमा यही है, गीत की...।

जय प्रकाश मिश्र

स्मारिका सी, स्मरी*.. याद रखने योग्य रति सी अप्रतिम सुंदर।

निर्मला * मन हृदय से भोली भाली, दुनियावी चतुराई से दूर।

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