आंचल फैलाए जब उसे मैं देखता हूँ!
आंचल..
फैलाए.., जब उसे...
हर पेड़ के,
ऊंचे.. शिखर पर
अवस्थित...,
सूखते.. किसी ठूंठ में..
अपाहिज.., विवर्णा..!
फटेहाल में, प्यासी प्रिये,
बैठा हुआ,
मैं... देखता हूँ,
हाल..
उसका, क्या कहूं!
तुम समझ लो,
असमय बूढ़ी हुई वह,
थकी सी,
मिचमिचाती बुझती हुई
आंखे लिए,
शून्य में तकती हुई
कर्मों की कालिख, लपेटे!
अपने नहीं,
हमारे...
चेहरों पे अपने
विवश हो कर सिसकती
तो क्या करूं!
मजबूर हूँ!
पाती तुम्हे प्रिय! मां की अपनी
लिख रहा हूँ।
किससे कहूं! ये भागती स्कूटरें!
कारें, टैंपोज और लोग!
क्या! पीछे छोडे! जा रहे हैं!
आगे...
एक सायकिल सवार से पूछा
तो बोला
अब सुरक्षित नहीं यहां चलना..
मेरा और इस प्रकृति का
साहब और
आगे..
मजबूरी है, हम दोनों की,
मेरी वित्तीय और उसकी मातृत्व।
बिना उम्र के ढल चुकी,
यौवना.. सी
ये मुरझती पत्तियां और
बच्चों से खिलते प्रिय
नन्हे नन्हे फूल!
थकी आंखों वाले शिशु! से
निहारते, पूछने लगे
कौन हो तुम!
मानव या दानव!
हे मेरा ये हाल करने वाले!
चले जाओ, मैं बिना खिले अब
सूखता.. देख! झरने को हूँ।
अंतिम संस्कार मेरा इन भागती
पहियों के नीचे तो होगा,
लेकिन तुम्हारा विनाश!
एक दिन!
देख लेना, मेरा श्राप है,
यह गोल आकार,
और यही यंत्र, कारण... बनेगा।
जय प्रकाश मिश्र
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