बस जिंदगी... बुनता रहा हूँ, आज तक!

मित्रों, आज हम और बच्चे अपनी सभ्यता संस्कृति छोड़ पाश्चात्य संस्कृति की नकल क्यों जीवन में पूर्णतया अपना रहे हैं। बदलती आदतें, खानपान, सोना जगना और प्राथमिकताएं हमारे जीवन को रोगी और लाचार बना रही हैं। इसी पर कुछ लाइने आपको प्रेषित हैं। आप एक एक पग आराम से पढ़ेंगे तो बेहतर आनंद पाएंगे।


युक्तियां... कितनी लगाईं,

रेशे.. बटोरे, चोंच.. से, 

बिहग.. 

से, 

जिस.. 

बिचारे.. पर..

एक रे! साधन.. नहीं थे ! 


कुछ..., इस तरह, मैं

जिंदगी... 

बुनता रहा हूँ, आज तक!

मकड़ी के वेब सी.. 

अनवरत! संग तेरे, 

गवाह है, तूं !

इतने दिनों से, जानती है! 

किसलिए? 


चल छोड़ इसको, देख तो...

अब बन गई...

और, बुन गई...

थी, "संस्कृति यह भारती" ...

पर, देख.. कैसे, 

उड़ रही, 

कंधों पे बैठी, हमारे... ही

पश्चिमी... 

इन, हवाओ.. संग 

जा.. मिली 

और

मेरे..., होते, 

फट रहा हो हृदय मेरा, 

उस तरह! 

हो.. तार-तारी, संस्कृति यह, फट रही ।


विमूढ़ हूं! 

यह देख कर!  मैं क्या करूं ! 

इन हवाओं को, 

पश्चिमी.... 

जो उजाड़ती... हैं घर मेरा, 

देश मेरा...

इतने दिनों का, था.. बसा! 

इन्हें कैसे... रोकूं !


कितना परिश्रम! कितनी तपस्या! 

लगी होगी!  सोच तो...

इस संस्कृति को बनाने में! 

कितने जनों की, 

कितने दिनों की! 

पिछड़े हुए इस देश में! 

कन्याकुमारी से लगा-यत कश्मीर रे! 


आज इसको, 

देखता हूँ, मिट रही, और मर रही! 

साथ... इन चलचित्र के, 

मोबाइलों पे, पिक्चरों में, 

नाटकों से.. 

बालकों के कार्टूनों बीच में

खुल रही इन शॉप्स में, अपने ही घर में।


हाल मेरा.. क्या कहूं!  

बस समझ लो..

भीगता!  बरसात में, 

ढलती हुई, किसी शाम में! 

चुप अकेला, 

पंछी हो बैठा..,  

एक सूखे पेड़ की 

किसी डाल पर.. 

वहां... शीर्ष, ऊपर...! 

उड़ चुका हो घोंसला 

मेरा, हवा में, 

गिर, 

सन.. चुका हो, मिट्टियों में ...

बह रहा हो बाढ़ में...

और मैं!  

बर्फ सी लगती हवा को

झेलता, 

दुखद होती रात को

बस, देखता हूं!  सोचता हूँ....

क्षर...

रही इस संस्कृति की 

दशा को

शाम है यह आज इसकी!  

फिर रात होगी, दर्द होगा, 

बढ़ेगा भी

इन सभी को, मुझी सा...

जानता हूँ! 

क्या करूं!  किससे कहूं! 

ये... हवाएं हैं, 

दूर की, 

इतनी अधिक प्रिय, क्यों लगीं

बस इन्हें अब देखता हूँ, 

तर्क अपने तौलता हूं! 


बदले हुए, इंसान के व्यबहार को

चुप!  देखता हूं!  

युक्तियां... कितनी लगाईं,

रेशे.. बटोरे, चोंच.. से, 

किसी! बिहग.. से 

मुझ, 

बिचारे.. पर

साधन.. नहीं थे, एक रे ।

कुछ..., इस तरह, मैं

जिंदगी... बुनता रहा हूँ, आज तक!

मकड़ी के वेब सी.. अनवरत!

संग तेरे, गवाह है, तूं ! मेरी जिंदगी में।

जय प्रकाश मिश्र




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