जीवन है ये, रुकता, नहीं, है
मित्रों, जीवन पहाड़ी नदी से ज्यादा जीवट लेकर बहता है, पत्थरों जैसे कठिन समस्याओं से लड़कर इसे आगे ही बढ़ना है, इसलिए समस्याएं हल होंगी ही एक दिन यह मानना चाहिए। इसी पर छोटी सी शब्द-पुंजिका आपके लिए।
क्या, कभी देखा!
प्रिये...
जीवन है, ये..
रुकता, नहीं,
किसी मोड पर..!
किसी के, लिए!
आगे... है,
बढ़ता..
कंटक नहीं अवरोध, कितने..!
पार.. करता, नदी सा,
आगे ही बहना, गुण है इसका।
छोड़ता...
संबंध सारे,
राग रंग.. एक दिन
बिलकुल.. अकेले।
जीवन है, ये.. रुकता, नहीं,
किसी मोड पर..! किसी के, लिए!
देखना!
जिन पत्तियों में
लिपट... कर,
प्रेम से..
ये.. बालियां... धान.. की,
ऊपर हैं, उठतीं...
रेंडती...
आश्रय.. हैं, पाती,
आश्रय.. हैं, पाती,
शिशु.. सरीखी,
मां... सी, अपनी..
छोड़.. देती हैं, उसी.. को,
जब.. गदरती.. हैं
रसभरी.. प्रिय!
निर्मम.. सी, होकर, जीवन यही है।
रुकता, नहीं, किसी मोड पर..!
किसी के, लिए!
ठीक, वैसे...
हम तुम
प्रिये..!
छोड़ते, पितु मात को
देख न,
अरे कैसे.. बड़े होकर!
नौकरी की चाह में,
भविष्य की उस राह में
इन, प्रिय आत्मजों को,
बंधुओं को, प्रियतरों को
जीवन है ये.. रुकता नहीं,
किसी मोड पर,
आगे है बढ़ता,
छोड़ता...
संबंध सारे, राग रंग,
बिल्कुल अकेले
पकड़ने, रंगीन सपने सलोने..
सपन के..,
नदी सा कल कल है बहता,
हे प्रिये! यह अंत तक।
जीवन है, ये..रुकता, नहीं,
किसी मोड पर..! किसी के, लिए!
जय प्रकाश मिश्र
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