इस, रूप के.., बाजार में बिकता, है क्या?

मित्रों, यह संसार, रूप का, इंद्रिय रसों का बाजार, लोगों का मन उन्हें इसी में लिप्त रखता है और अतीन्द्रिय आनंद से वंचित करता रहता है। इसी पर कुछ लाइने आप के आनन्दार्थ।

इस..,
रूप.. के.., 
बाजार.... में.. 
बिकता..., है क्या? 
बता.. ना..! 
अरे..  मन.. तेरा!  
बस मन तेरा.. और मन.. तेरा..।

और क्या..? 
लेकर..., 
वहां से लौटता.... है? 
पूछता हूं! बाजार से... इस..! 
बोल ना! 
सच.. बोल.. ना,
बस, मन... भरा, 
मन भरा..., एक मन.. भरा...।

कब.. तक भरेगा?
अरे! 
इसको..
सोच... तो..!
रूप है, स्थिर कहां! 
पल... में, बदलता.!

चंद्रमा...! 
रे, 
चंद्रमा है, मन तेरा...! 
ऊंचे.. वहां...!
लटका... हुआ..
आता.., नहीं.. है, हाथ... में
पर.. चमकता..है, 
रेणु सा।
स्थिर.. कहां है? देख ना, 
दिशाएं, आकार 
सब.. 
ले..
है बदलता... 
क्षण अनुक्षण नवलता! 

इस लिए तो कह रहा हूँ
रूप यह! सौंदर्य यह!
और मन तेरा!
सारे... 
बदलते.., रात दिन.. 
और, तूं....प्रिय
इन्हीं 
में 
है, खोजता...आनंद अपना...
भोला है, क्या... रे! 
अभी इतना...!

सोच तो, 
रूप.. के, बाजार.... 
में.... 
बिकता..., है क्या! 
मन तेरा, मन तेरा.. बस! मन.. तेरा..।

मन है तूं! कभी सोच ना! 
नहीं... रे! 
तूं मन.. नहीं है, मन तो है 
परमाणु निर्मित! 
लौकिक... है, ये..
सत्य सुन! 
मिट्टी का बना...।

अलौकिक.. तूं! 
क्यों... 
मिट्टियों.. में, 
रंग.. में, रूप.. में, सौंदर्य.. में, 
प्रसाधनों.. में, 
इस तरह मिल 
मन के रंग, रंग
प्रिय! आ.. फंसा! 

ऊपर तो आ! 
देख! 
कैसी.. ताज़गी है, 
पुष्प.. के उर.., मधु... 
भरी है..! 

सरस रस, 
बहता... यहां, 
हृदय की अनुभूति का....
आनंद भरता, अजर.. रे!  
आनंद... भरता....!
चंद्रमा, एक उदित होता, 
स्वच्छ प्रिय! यह पूर्णिमा का! 
स्वच्छ प्रिय! 
यह पूर्णिमा का। 

जय प्रकाश मिश्र



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