मनः स्थित, स्फुरित इस झील में,

मित्रों, हम सभी के भीतर अंतस्थल में शांति का एक विस्तृत सागर लहरता है। जो सांसारिक दौड़ भाग से दूर नितांत अलग परिवेश में होता है। मनस्वी और योगी जन इसका नित्य सेवन कर आनंद प्राप्त करते हैं। इसी पर संक्षिप्त लाइने आपके लिए।

अरे..! 
कैसा, यह जगत! 
मेरे ही, अंदर
चल.. रहा..;
अकेला
मैं..  
अपने.. संग 
आज हूँ, जब.. मिल रहा! 

छोड़.. प्रिय 
यह, 
बाहरी... जग, 
धड़कनों को मात्र
अपनी.. 
सुन... रहा;
हर एक धड़कन 
लहर है...
उर्मि.. है, रश्मि.. है,
बैठ इन पर, साथ इनके 
जग प्रिये मैं, तिर रहा।

हिलकता सागर है यह
मेरे वक्ष भीतर
परम निर्मल, 
यहीं से
संसार को मैं देखता.... 
उधम.. मचा है,
कश्तियां.. नव्या, नवेली... 
"पर" लिए नव तितलियों सी...
कल्पना… की पाल.. बांधे, 
रंग बिरंगी, तिर.. रही..
अनुभूतता.. हूँ! 

यहां.. पर, 
बस! 
स्वांस.. बन,
मैं... तैरता... हूँ..! 
अनिवर्चनीया.. शांति! निर्मल! 
मनः स्थित, स्फुरित 
इस झील में,
विस्तीर्ण.. 
विपुला.. कान्तिमय,
रंग बदलती, आकाश की किसी
तारिका सी, रूपसी यह  
सुंदर, मनोरम! मधुर रसमय! 
दृश्य कैसा! 
स्फुरन है, बिन पवन! 
हे पिये, कैसा! 
आनंद ही, हो.. बरसता
अंग में, उछलता! क्या करूं
सम्भार है यह, अजित रूपल रूप का।

किसी मत्स्य सा, 
मैं डूबता
और.. गहरे, डूबता..
स्प्लाश करता, 
जा रहा हूं! मगन मन, 
आकाश घन में, विहरता।

जय प्रकाश मिश्र





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