तुम मेरे नजदीक आओ, हिये बैठो!

तुम...! मेरे... नजदीक, आओ..., 

हिये*..!  बैठो...

बात..., कोई..!  शुरू कर दो! 

उन..., दिनों.. की, 

सलोने..., 

किशोर.. वय! 

जब, युगल थे, हम

स्वच्छ मन..,  विचारों.. से,

युक्त थे, मुक्त थे,  हर बंधनों  से, 

मुक्ता.., सरी..खे...ओस.. कण... से, 

शुद्ध.. थे, हम

तेज से, कौमार्य से, प्रिय, लसे थे हम


चढ़... रही, 

उस उम्र की दहलीज... पर ! 

बार... पहली, 

साथ हम... तुम...

नवेले!  

नवेले अंदाज ले, ले उड़ रहे थे..।

किस... तरह हम, 

बिहरते थे, 

पात हो, केले.. का कोई, 

हिल रहा, 

धीमे... 

पवन के, झकोंरों से

ठंडई.... आहें, लिए, हिलमिल रहे थे।


जिंदगी की थाप पर, 

नचता हुआ।

फ़िर वही सुर गुनगुनाओ, 

पार्श्व में मेरे बैठकर,

पेड़ के छाया तले उस... सघनतम 

आज मुझको, 

एक बार फिर से, घुमाओ।

तुम मेरे, नजदीक आओ।


तुम मेरे, नजदीक आओ।

हिये बैठो! ठीक वैसे गीत गाओ

एक बार 

फिर से उन्हीं स्वर में गुनगुनाओ

स्तब्ध हो जाऊं! 

तुझे में देखकर, 

श्रृंगार प्रिय! ऐसा... बनाओ..

तुम मेरे नजदीक आओ

हिये बैठो! 


तुम मेरे नजदीक आओ

ठीक वैसी बांसुरी फिर से सुनाओ! 

छंद कोई मुक्त हो, 

उड़ता हुआ

राग भैरव-भैरवी 

होठ पर, 

मेरे प्रिये, एक बार लाओ...

तुम मेरे नजदीक आओ।।।


हिये बैठो! फिर वहीं सपने दिखाओ।

होठ की वह लालिमा, 

रतनार धागे, 

आंख में, वो... तैरते... 

गुलाबी मुखड़ा तेरा वह शर्म ओढ़े! 

जो झांकता था दिल में मेरे! 

आज प्रिय एक बार फिर से 

दिखाओ

तुम मेरे नजदीक आओ

हिये बैठो! 

ठीक वैसे छू मुझे, अंग से लगाओ।

तुम मेरे नजदीक आओ ! 

तुम मेरे नजदीक आओ ! 


जय प्रकाश मिश्र

हिये* बैठो:  हृदय के पास अतः पूर्ण संवेदन शील होकर बात सुनो

 

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