इस सृष्टि का अमृत..! कहां है?
मित्रों, यह सारी सृष्टि मात्र आपसी प्रेम के गुण से ही संचालित है। दो द्रव्यमान वे कोई भी हों उनके बीच एक खिंचाव प्रकृतितः होता है। इसी पर कुछ लाइने आपके आनन्दार्थ।
हे
मित्र!
मैं..., कितने..
दिनों.. से, जी.. रहा!
जग देखता.., मर्म इसका..
खोजता ! ढूंढता हूँ!
सृष्टि का अमृत..!
कहां.. पर
है, रखा!
कोने,
में.. किस?
कैसे छुपा है?
जिसको.. लिए,
अनवरत..!
जग... चल रहा है..।
आखिर! कहां है!
केंद्र इसका
जिसकी..,परिधि
पर,
चक्र यह..!
प्राणियों.. का,
प्रकृति का! इतने दिनों से,
देख...न!
नियमित! अबाधित!
दुख सुख लिए,
अमृत पिये, कैसा.. प्रिये,
इस शून्य में,
ब्रह्मांड के,
सूर्य
के, संग चल रहा है!
जीवन
ही, क्या है ?
युग्मता! संयोजना है!
द्रव्य की, क्यों? परमाणुओं.. की..
और यही तो, वह.. प्रकृति.. है,
प्रिय! प्रिय मिलन... की,
हर एक, कण को
खींचता है
दूसरा..
आत्मता से एकसंग,
नजदीक आना चाहता है,
किस लिए! सोचो
जरा, बस
इसलिए
कुछ
घटित हो, नवीन हो,
अभिव्यंजना, आगे बढ़े, इस जगत की।
तुम पूछते हो, मित्र मेरे!
आखिर ये क्यों है,
तो सुनो..
"पास-आओ"
आकर्षण..
सदा एक दूसरे से..
इस धरा पर ही, नहीं..,
इस ब्रह्मांड में है
फैला हुआ।
यही तो
गुरुत्व
है,
एक प्यास है,
आदि से ले आज तक
इस सृष्टि में, फैला... हुआ।
अरे! यह ही, प्रेम.. है,
सना है, इस
सृष्टि में
आकर्षण प्रिये है, यही तो
इन इंद्रियों में,
प्यास बन कर भरा है,
रज की प्रिये, यह चाहना है।
यह "प्यास" ही अमृत है प्रिय!
यह कामना है,
इच्छा.यही.
है,
मन
इंद्रियों की
जिसके लिए जग चल रहा है।
यह समाई है हर कणों
परमाणु में, क्षुद्र में
संभ्रांत में
एक सी.. मिटती नहीं है।
यही तो अमृत है प्रिय!
जिसको लिए
जग चल रहा है ।
जग प्यास है इन इंद्रियों की
इससे ज्यादा कुछ नहीं है
तृप्ति से, शांति से
संयम से
प्रिय
यह दीखती है,
दीखती,.... है।
जय प्रकाश मिश्र
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