कितनी.. धुनें! और गीत.. कितने!
मित्रों जीवन कितनी और कैसी जटिल गांठों से भरा है, हम सभी रोज इनसे आंखे चार करते ही हैं। मध्यम और सम जीवन ही सुखी जीवन है। इसी पर एक शब्द-पुष्करिणी आपको आनन्दार्थ प्रेषित हैं।
कितनी.. धुनें! और गीत.. कितने!
पास.. तेरे, हैं.. रखे..!
ऐ..!
जिंदगी..!
रोज गाते! रोज बजते!
देखता हूं, सुन रहा, अवधान ले.. ले..!
क्या है ये..!
कोई तमाशा है!
हर एक, दिन का, बोल न!
तूं...
हे.. शुभे!
मतलब तेरा.. क्या? इन सभी.. से!
शांत
सरिता,
क्या नहीं,
अच्छी है होती..!
लोग बसते किनारों पे, हरीले..!
मछलियां.. भी उछलती
रंगीली...
उन...., जलों में
पेड़, पौधे, जीव हँसते
खेलते बच्चे
हमारे,
बिन बहे! इन ड्रग्स में,
बिन गिरे, मद्य की इन नालियों में!
"तूफान" क्यों है,
अंक तेरे!
इतना भरा ! बता न!
तूं...
हे.. शुभे!
मतलब.. तेरा क्या! इन.. सभी से !
स्वाद!
अरे, स्वाद कितना.. चाहिए?
अरे...! कैसा.. चाहिए!
तूं बता.. मुझको, जिंदगी!
भरती... नहीं,
खाली... ही तूं!
जहां तक मैं देखता हूँ!
पेंदा नहीं,
तल... ही नहीं,
तृषित क्या, प्यासी ही तूं!
क्या है ये..!
कोई तमाशा है!
हर एक, दिन का, बोल न!
तूं...
हे.. शुभे!
मतलब तेरा.. क्या? इन सभी से!
मीठा, मधुर, अमचुर
नहीं...,
कसैला, तीखा, जलाता
जीभ को
स्वाद तुझको चाहिए!
जो भस्म करता रस्म को,
राग ही क्यों!
सत्य है, श्राप! से श्रापित है तूं!
हाल..
तेरा देखता हूं...
रोज गिरते नालियों में,
रोज बहते प्यालियो में
हर, शाम छनते...,
रंगीली उन रौशनी में,
हौले! हौले!
छोड़ बच्चे नन्हे मुन्ने
घरों... पर
नाचते...
ऐ, जिंदगी स्टेज पे...।
इसलिए तो पूछता हूँ
कितनी.. धुनें! और गीत.. कितने!
पास.. तेरे, हैं.. रखे..!
ऐ..!
जिंदगी..!
रोज गाते! और बजते!
देखता मैं, सुन रहा हूं, कान.. अपने!
क्या है ये..!
कोई तमाशा है!
हर एक दिन का, बोल न!
तूं...
हे.. शुभे!
मतलब तेरा.. क्या! इन सभी.. से!
जय प्रकाश मिश्र
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