उस नदी.. का, सपना भी था!
मित्रों, जीवन और मित्र दोनों एक दूसरे के पूरक होते हैं अगर सच्चाई रिश्ते में हो तभी नहीं तो जीवन किसी एक के साथ कटता ही है। इसी पर छोटी सी रसवेणि आपके लिए।
बता न!
हे! मित्र.., उसका,
अरे, क्या... आंचल! है... मैला?
मैं, पूछता.. हूँ...?
जो... दूध.. पीते,
बच्चे.. के, मुख... से,
एक बार ना, सौ बार! मित्तर...
हो, पुंछा..।
इतना ही क्यों, चीकस..भी हो,
गंदला, कितनी जगह से,
झर, झर-फटा।
या....
मन है, मैला...!
अरे...! उसका...
पुष्प-मुख! इतना मधुर!
आ-प्रियल.. शिशु का
छोड़ कर...,
हड्डियों की हांडियों में, डालियों में,
पातियों में, मांस की
है.. आ फंसा,
जिसमें प्रिये! यह शिशु,
स्वरूपा...
पुष्प.. सुंदर, है.. खिला।
भूखे हैं दोनों!
एक.. से,
मन से कोई, कोई पेट से...!
बिकल हो, हो खोजते ,
सामान अपना!
एक सा...।
चतुर हैं ये..., ध्यान-मग्ना!
एकाग्र.. हैं,
उस रूप की, अभि-रामिता में..
स्वाद है जो, रूप है जो
अमृत है जो!
बहती... नदी का।
एक मैं हूँ!
देखता, यह खेल! गुप, चुप!
तुमसे,
क्या.. कहूं!
जीवन हैं, दोनों,
एक उठ रहा आकाश में
एक गिर रहा
है....
गर्त... में,
बोल न! अरे यह किसने कहा?
ये,
एक से, ही
बस मतलबी.. दोनों प्रिये!
बहती... नदी के।
नदी तो
वह.. एक है!
जाने न कितने लोग
इसपर...
दिवस.. निशि..
इस पार से उस पार होते।।।
पर
दूर से,
वे.. नहीं...,
कभी.., जल हैं, छूते! हाथ से,
हे प्रिये!
पाक, इस बहती.. नदी का।
यद्यपि...
नदी.. संवेदना है,
शर्म, लज्जा, शील इसकी ..
प्राकृतिक, आभूषणा... है।
इसलिए, यह मूक होकर
जी रही है,
समाज को यह...
अकेली ही सिल रही है।
सब जानती है,
जीते जी,
अर्पण.. नहीं..
तर्पण.. भी अपना कर रही है!
इसलिए..
इस नदी को अब, फर्क क्या?
कौन उतरा पार!
कौन!
होकर साथ..
इसमें... बह गया,
पर....
कहीं... कोई एक था !
नदी.. का, सपना भी था!
हृदय ही था, दूर रह भी हे प्रिये!
इसके लिए,
जन्म भर, वह दूर था,
अपना... रहा।
जय प्रकाश मिश्र
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