जग.. यह, क्या है?


बहुत दिनों से, सोच.. रहा हूँ,
जग.. यह, क्या है? 
इंद्रिय.. भर!  
अनुगम्य..
प्रिये.., 
बस! 

नहीं मुझे 
विश्वास नहीं  है, 
तनिक भी इस.. पर..।
इसीलिए तो, 
खोज 
रहा 
हूँ
उससे, वर-तर.. 
इसमें क्या.. 
है, 
जिसे 
लिए जग, उद्धत पल.. पल..।

जीवन को संरक्षित 
करता, 
पृथ्वी को, 
आनंदित करता, डोल रहा यह! 

अंतस इसका खोज रहा हूँ
क्या जग ऐसे, बिना 
लक्ष्य 
के.. 
शून्य प्रहर से 
आज... दिवस तक!  
इतनी ऊर्जा!  इतनी ऊष्मा!  
अनायास ही, मानव.. तन में, 
मानव... मन में, 
जीव.., प्राण... में घोल रहा है।

बस, लहरों.. का,
आना.. जाना
अंतराल 
पर, 
काल 
पटल.. पर, 
प्रलय-सृजन का, 
खेल कोई यह युग युग से ले 
आज! अभी तक!  खेल.. रहा है।

देख मनुज को,
सच कहता हूं, व्यथित बहुत हूं! 
आपाधापी के इस युग में, 
पिसते उसको, 
और..
दिनों दिन.. 
देख.. 
रहा.. हूँ! 
क्या.., होना.. था! 
क्या.. होता..! 
मैं..देख.. रहा हूँ! 

शर्मिंदा हूँ, 
इतनी उन्नति! 
के शिखरों पर खड़े मनुज को
श्वानो से भी, प्रिय 
बदतर.. , मैं.. देख रहा हूँ! 

इंद्रिय से ऊपर था, उठना..
इंद्रिय रस में उसे
विलपता 
देख
रहा हूं! 
यात्रा करनी थी 
देवों तक 
जिसे प्रिये हे! 
रक्त रुधिर में, शिशुओं के 
मैं....
लिपटा 
उसको, देख रहा हूँ! 

कैसे कह दूं..
इतनी ऊर्जा, इतनी ऊष्मा, 
इतना तापन, 
अरे सूर्य.... का
मिट्टी में मिलता आंखों से 
देख रहा हूँ।

इसी लिए 
कोने.. में बैठा
अंधकार के दरवाजे पर! 
मनुज तुम्हारा, अंत यहां से देख रहा हूँ।

जय प्रकाश मिश्र


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