मुझे तो, ताज्जुब.. हुआ!

मित्रों, अपना जीवन.., अपनी देह, और शाश्वत आत्मत्व इन दोनों का काल बाधित संयुग्मित अनुष्ठान है। मैं पना इसी में रस सा बहता है और संसार बन जाता है। अवसान एक निर्धारित दशा है। गुजरना सभी को है, इस गली कभी ना कभी, इसी पर संक्षिप्त लाइने आप के आनन्दार्थ।

हे....! 
मेरे.. प्रिय..! छांह..., 
दे.. दो, 
तरु... की नहीं.., 
अपनी.. प्रिये! 
मैं... जिंदगी हूँ! दूसरे की, 
नहीं.. प्रिय..
तुम्हारी... 
अपनी.. सखे! देख.. मुझको! 
सच, जादुई, मैं... जिंदगी हूँ।

मिलना..., था.. मुश्किल! 
सच,... में!  
तुझसे..,
ऐ... 
जिंदगी..! 
नजदीक.. से, पास.. से, 
हाथ.. में ले, हाथ, तेरा.. 
पकड़ कर, 
अनुभूति.. करना, 
निकटता की, इस तरह..! 
इतना.., कठिन! 
पता.. न 
था।

कुछ, भी... नहीं.. था, 
हाथ... तेरे, 
उम्र, सारी.. बीतने पर...
खाली.. था, रे...! 
अंतिम समय.. से, 
थोड़ा.. पहले! 
गुजरता.. 
इस, हाल... में,
सच! देख..., तुमको..
मुझे तो, ताज्जुब.. हुआ! 
अंत में, किस तरह..,  
ऐ! जिंदगी, 
सामना तुझसे हुआ।

ठहरा.. हुआ 
कोई... हो, ठट्टर...! 
नजदीक से देखा, तुझे.., 
अस्थियों.. का.. 
सामने..., 
समर्पण.. प्रिय, 
आपाद.. मस्तक, कर.. चुका..हो।
सारे अहम, को वहम को
हर.. छोड़ कर,
मैं.. पना से, दूर होकर
चुप! चुप! अकेला
पड़ा तूं था
घिरा... 
पिय!  निर शांति में, 
अपनी... ही, घुप... था! 

सोचा न था! 
ऐसा.. भी होगा! 
मिलना पिये! यह मिलन तुमसे।
ऐ जिंदगी, 
दूर.. हो, सारे.. विभव* से।

नेत्र हों निर्जीव! मध्यम ज्योति मिश्रित! 
बिकलता से, एषणा* से दूर स्थित! 
विचारों में, धूम्र* में, 
या उड़ रहे 
उन 
बादलों में
कल्पना के, काल धूमिल 
चित्र! में, 
मैं देख तुमको, 
स्वयं प्रिय, विस्मित नहीं! 
चिंतित! हुआ अब।

खुला.. मुंख, सूखे.. अधर! 
स्वाद.. से, ये..
आज
प्रिय.., कितने विलग.., 
बेखबर! 
सारे दुखों से, सुखों से
कागज हों सूखे, 
और पतले, 
मरोड़े! यूं कान तेरे! पीले पड़े!  
ऐ... जिंदगी! कहां... है... 
तूं! 
रसीली! 

पान की पीकें थी सजती! 
होष्ठ पर जिस! 
क्या? वाष्प.. थी, तूं! 
और.. मैं..., 
क्या, रस.. था तेरा.., 
अन्यथा! देख न! सूखा... ठठेरा.. 
पड़ा हूँ, 
इन सलवटों में चित्र! 
सा।।।, 
दुबका हुआ! 
जिंदगी.....! 
ऐ..., जिंदगी...! 
तुझे... खोजता हूँ! कहां.. है, तूं.....! 

जय प्रकाश मिश्र
विभव * जीवन की सारी संपदा 
एषणा * जीवन को सारी इच्छाएं
धूम्र* भरम का संसार


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