मैं..., कहां.. हूँ? कौन हूँ!

खोजता हूं! 
मैं..., कहां.. हूँ? कौन हूँ! 
क्या आज से! 
नहीं री.. कई जन्म से! 
मैं उतरता हूं, 
भूमि... पर, इस,
भूलता हूँ, लक्ष्य.. अपना...
सुख.. प्रिये!  मैं खोजता...
दुःख.. समाता हूँ,
युग.. युगों... 
से, 
इसी क्रम में लगा हूँ।

बीच तेरे  'नाम' हूँ,
कुछ भी रख लो, 
तर्क... से 
यह नाम मेरा, प्रिय.. परे है,
हर तरह ही।

एक लेबल मात्र! बस..
चिपकाया हुआ,  
प्रिय! मेरे ऊपर
बाहर कहीं, 
अदृश्य.. पट्टा है, पड़ा..,
जो जानते हैं, देखते हैं, बुलाते  हैं
नाम... से,
शेष... को
मैं.. दो पदों का, आदमी.. हूँ।

कभी  'यह' प्रिये!  
कभी 'वह' प्रिये, बन.. घूमता हूं।
इन.. पुतलियों में, 
हाथ.. की इन उंगलियों में, 
विशिष्ट.. है कुछ, 
मेरा.. छिपा,'
वे; जानते हैं, यंत्र कुछ,
सच  मैं नहीं, 
मैं तो खुद को, खोजता हूँ
मैं कौन हूँ! 

भीतर.. मेरे, बाहर.. मेरे, 
निज... नाम में, निज... रूप में,
कहीं फोटुओं में अटेस्टेड..
चिपका हुआ, मैं... पेपरों में
कहीं बल्दियत के साथ, हूँ 
कहीं बल्दियत के बिना! भी !

कहीं कागजों में, 
रोशनाई, के रंगों में,
हस्ताक्षर के रूप में हूँ
क्या कहूं! कितना कहूं! 
सोचता हूँ!  
अरे क्या....
यह,  
मैं.. 
वह,  मैं...ही हूँ..।

इन सभी में, हैरान हूँ! 
आखिर! हे मित्रों? 
मैं... कहां हूं! 
कौन हूँ! 

जय प्रकाश मिश्र

Comments

Popular posts from this blog

मेरी, छोटी… सी, बेटी बड़ी हो गई.. जब वो.. पर्दे से

पेंशन बिन जिंदगी, मेरी ये खाली हो गई है।

चलो पेरिस की एक शाम से मिलें!