ये जिंदगी अपनी प्रिये।
मित्रों, 'जीवन की सलवटों' पर एक छोटी सी, रश्मिका आपको प्रस्तुत है आप पढ़कर मात्र, आनंद लें।
पगडण्डियां हैं, रास्ते हैं,
मार्ग हैं कुछ!
संकरे हैं कुछ, विस्तीर्ण कुछ...!
जीवन है ये... फूल सा
खिलता प्रिये!
झिलमिलाता क्षणों में,
चमकता यह चन्द्र सा,
दीप सा बुझता... प्रिये... !
मैं क्या कहूं!
जिस तरफ, भी... देखता हूँ
भीड़... है,
बस.... कुछ समय की,
जिंदगी की रस्म सब,
देखते... ही देखते...
फिर, भस्म सब,
मैं क्या कहूं!
बेल... है, ये
जिंदगी! रुकती... कहां है?
कैसी मनोहर! दिव्य है,
उतरती, कहां है,
आभा लिए यह, मोहती.. है...
क्या... चीज है,
मुक्त है.... यह, हर... किसी से
बस, कुछ ही, दिन... की;
सुर.. खत्म फिर, अपने में, गुम है..
जिंदगी है, प्रिये! इस पर
क्या कहूं!
चमक के पीछे, जमाना,
भागता है
गलत.. क्या है,
कुछ चाहता है, मित्र से,
वह..., अनैतिक!
गलत... क्या है,
सूर्य सी उठती हुई, यह
शाम को ही डूबती... है,
गलत.. क्या है,
जिंदगी है,
उत्तुंग.. श्रृंग.. कुचलती है
गलत.. क्या है....
दिशाओं में गूंजती है, महकती है
दिलों में, मन बांधती,
स्वर्ण की उन
पेटियों में, उलझती,
प्रिय,
गलत क्या है?
गलत है, जब अकेली,
बेबस... प्रिये!
अनजान गलियों,
अंधेरों... में,
सिसकती... दम तोड़ती है!
देखता हूँ,
रोज इसको, 'रोज' सा खिलते हुए
सजते हुए, दिपते हुए,
स्नेह में पलते हुए;
पढ़ते हुए, लिखते हुए,
पद धारते,
प्रिय!
मोह में पड़ते हुए,
जाल है, यह रश्मियों का,
चमकती,
उलझते, उबरते, फंसते हुए...
क्या क्या कहूं!
मस्त! कैसी, चाल में चलते हुए।
पर वेदना है, कष्ट है
सच है, प्रिये!
अंत में,
रोते हुए, बिलखते,
अवसाद में, जीते हुए
ये जिंदगी है, अपनी प्रिये!
ये जिंदगी अपनी प्रिये।
जय प्रकाश मिश्र
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