वह.. बात, तुमसे.. कब कहूं?

मित्रों, निजी संबंधों में विचारों की भिन्नता ही नहीं एक दूसरे के मनोभाव को समझने की भी समस्या खड़ी हो रही है, एक की सोच दूसरे को मूल रूप में पारगमित नहीं हो रही, इसे भाषा, स्किल या दिमाग में अन्यथा की चीजे भरी होने से पूर्वाग्रह आदि कुछ भी कहें। इसी पर कुछ लाइने उन लोगों को समर्पित जिनके निजी संबंधों में विभिन्न कारणों से दरार हैं और शेष के आनंद हेतु। 

प्रिय! 
मिलन.. तुमसे, 
कठिन है, मैं... जानती हूं! 
इस..तरह..
इस जगह पर, मैं मानती हूँ।
भीड़... है, 
कितनी.. यहां पर! 
नित्य ही, मैं....
देखती हूँ, जूझती.. हूँ!  
लड़.. रही, 
अंतर्मनों में..बन रहा 
जितना.. प्रिये.. 
मैं, कर.. रही,
पर क्या करूं, 
तुम.. तक, नहीं, मैं.. पहुंचती हूं।

सबके भीतर, 
बेवजह..! 
यह!  
इस जहां... में, 
विचारों की, दौड़, ऐसी..! 
भाग, भागम-भाग, कैसी..? 
जिंदगी... में
पहले जैसी, शांति..  वैसी..! 
अब नहीं है....।
समझती हूँ! बच्ची नहीं हूँ! 
इसलिए! शायद.. 
प्रिये! 
तुम तक, नहीं.., मैं.. पहुंचती हूं।

रेला...., लगा है, 
जिंदगी को, 
सजाने 
का, 
हर तरफ.. 
बस जिंदगी भर..! 
उसके आगे, सोच., रत्ती भर. नहीं।

यथार्थ! में जीते.. हो,  तुम प्रिय! 
यथार्थ! कोलाहल भरा है! 
देखती हूं! 
तुम..
शब्द मेरे, कब पढ़ोगे!  
कितनी समझ में 
आएंगे, ये..,
मुश्किल.. में हूँ! 
ये ज्वार-भाटा देख कर, 
हैरान हूँ! 
"वह.. बात" तुमसे.. कब कहूं? 

फिसल.. जाए, 
कहीं.. तुमसे, बात मेरी.. 
छूटती.., गाड़ी सी, इस
प्रिये! इस माहौल में...
मैं डर.. रही हूँ, 
सोच कर...
मैं...,  कहां.. हूंगी।

क्या कोई है रास्ता, सीधे मिलें हम! 
बीच में कोई न.. हो,
दीवार! बन..! 
एक नन्हा शिशु 
कोई, 
हंसता.. हुआ, 
मुक्त...मन
काम से लौटी हुई 
मां.. को अपनी, देखकर, 
जैसे हंसे!  वैसे.. हंसे हम।
मिल रहा यह!  
बाल शिशु! 
मां से भूखी, जिस.. तरह, 
थक चुकी.. दिन भर प्रिये..
आवेग.. ले,
वैसे.. मिलें, हम।
 
शोर.. यह, सारा.. शराबा, 
खराबा...
प्रिय! जहां... 
पर, बिल्कुल.. न हो! 
पर, प्रिये!  यह,  यहां पर! संभव नहीं।

रास्ता... 
एक.. है, प्रिये! 
मैं.. मानती हूँ 
समझती हूं! मुक्त.. सबसे..
भाषा नहीं, मौन ही
इशारों का, 
दूर... से, 
नदी के उस पार से जो, बोलता..है
साफ, बिल्कुल.. साफ! 
तुम, समझो!  प्रिये.. 
बस... अगरचे...! तुम फ्री तो हो! 
मूर्ख की, भाषा है ये..
पर, दिल.. की, है, 
घुसती.., 
बहुत भीतर प्रिये 
मन को, छूती..।
सोचती हूँ, इसी का, मैं वरन कर लूं।

शब्द सब बेकार मेरे..
बहु अर्थ इनके, 
क्या सत्य है,
कौन?  समझाए, तुम्हें! 
भावार्थ इनके...।
व्यर्थ है, सब..
पृष्ठ.. कैसे साफ.. हो, 
तभी तो अक्षर दिखें..
काट... दो, उस पृष्ठ को
रहने न दो, कुछ.. 
सच प्रिये! 
माहौल यह, खाली करो! 

प्रिय, बात.. ऐसे, 
तुम.. करो,
खुलो तो, अंतःकरण से
आत्मा की बात, 
मेरी आत्मा में, अनछुई.., 
तुम, प्रिये... रख दो।

जय प्रकाश मिश्र









Comments

Popular posts from this blog

मेरी, छोटी… सी, बेटी बड़ी हो गई.. जब वो.. पर्दे से

पेंशन बिन जिंदगी, मेरी ये खाली हो गई है।

चलो पेरिस की एक शाम से मिलें!