कितना बड़ा दिल है, तुम्हारा..!

मित्रों, ऊंचे.. पद, प्रतिष्ठा और सभ्यता वाले लोग आज जीवन के अनिवार्य तत्वों  से हट गए हैं। उनका लक्ष्य स्वार्थ से प्रभावित होकर, सीमित रह गया है। सारी मनुष्यता, उनके अपने और अपने लोगों के आगे बौनी रह गई। उनसे अच्छी सोच छोटे लोगों की देख रहा हूं। इसी पर चंद लाइने आप के आनन्दार्थ लिखी हैं।

हे..  'अंधेरे'*..! 
वह, क्या.. है, तुममें..? 
समा.. लेते हो, सभी.. को, 
हृदय अपने।
एक.. जैसे.. बिना.. देखे,
कौन है किस, पक्ष का
अंतर नहीं, 
कोई.. हो, करते... 
बड़े.. छोटे, काले.. उजले।
अंधेरे*..! 
तुम्ह!  कितने.., अच्छे! 

कितना... बड़ा 
दिल..! है, 
तुम्हारा...
हम, आदमी हैं, 
सभ्यता के, शीर्ष पर,  
पर,  बहुत.. छोटे..।

दिल..!  
दिल.. कहां है? 
अब! किसी के पास.. भाई! 
भावज.. नहीं, 
भाई... से- भाई...
बेटे.. से- माई...
सभी.. हैं, संबंध..  झूठे! 
हे.. अंधेरे..! वह, क्या.. है, तुममें..? 
समा लेते हो, सभी.. को, हृदय अपने..।

अपना.. पना! सपना... हुआ!
देखते.. ही, देखते..!
यह क्या हुआ
आदमी, 
झूठा..
हुआ, 
नेता से बढ़ के!
हे.. 'अंधेरे'*..!  तुम्ह!  उनसे अच्छे! 

आज तक बदले.. नहीं तुम..
रंग.. वही, ढंग.. वही
आदत.. वही..
सच.. 
आज! तक 
वैसे... के, वैसे..! 
"मूर्ख है क्या?"  पूछता है, 
एक बच्चा!
क्लास 
में, 
पहली.. अभी, भर्ती हुआ!
सोचता हूँ, कहां.. थे, 
कहां... हैं, हम... 
आ.. गये। 

हे.. अंधेरे..! 
वह, क्या.. है, तुममें..? 
समा लेते हो, सभी.. को,
हृदय अपने.., 
प्रिय...!  
एक.. जैसे..
अंतर नहीं, कोई.. हो, करते...!

कितना... बड़ा दिल! है तुम्हारा...
हम, आदमी हैं, 

सभ्यता के, शीर्ष पर,  
पर, बहुत.. छोटे..।
जय प्रकाश मिश्र

अंधेरे * छोटे तपके के गरीब और ग्रामीण कम पढ़ें लिखे सामान्य लोग।


दो फलक उसके प्रिये!  

एक, दीखता.. है, 

सामने.., 

एक सदा पीछे..पारदर्शी!  

मौन.. रहता!  

देखता है, अनुभूति करता, 

सारी.. प्रिये, 

यह आदि.. से, ले आज तक

क्षण अनुक्षण, क्षरण.. होता

बदलता है रूप अपना,

स्वप्न सा, 

और क्या संसार यह,

प्रिय! रीता.. रीता...।


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