पंखुरी! तेरी, गली.. वह नहीं रे! !
मित्रों! आज कल प्रायः हमारी प्यारी बच्चियां सयानी और प्रबुद्ध होते हुए भी कभी कभी ऐसे रास्ते चुन लेती हैं जो समाजा के ताने बाने और संस्कृति, संस्कारों से मेल नहीं खाता। अपना जीवन ही नहीं अपने स्वजनों का जीवन और मर्यादा भी नर्क बना देती हैं। इसी पर कुछ लाइने आप मित्रों को प्रेषित हैं।
पंखुरी...!
ऐ! री..! पं..खुरी...! ....!
जब, तूं.. खुली...,
री.. हां..
जब.. तूं, खुली....
खुल कर.., ऐसे खिली...
फिर...
स..कुची... न क्यों?
हां, री.. सकुची...न क्यों!
कुछ, क्या..,
बा..की, अभी..
अब भी..., बाकी.. बची...
प्रिय.. थीं, बाकी.. बचीं
तुझसे..,
कसकें... मेरी...,
क्या री..! कसकें... मेरी...,
तूं...! लचकी...
ही.. क्यों?
ऐसे! लचकी, ही क्यों!
पंखुरी...!
ऐ, री... पंखुरी... ...!
मेरी..
प्यारी, पंखुरी...
ओ.. री.., न्यारी.. पंखुरी..!
क्यों.. तूं, इतनी.... खिली..!
हां री.., इतनी खिली...!
काहे...! इतनी.. खिली..?
सौरभ! घेरे, खड़ी..
लक-झक, स्निग्धा हुई..
क्यों ना,
जड़.. से जुड़ी..?
पर! थी जड़.. से जुड़ी...
तूं तो, कभी ना, हिली..
फिर क्यूं!
ऐसी...? गली.,
मेरी... प्यारी! चली...।
पं..खुरी...! ओ, री.. पंखुरी!
ये.. है,
उपवन.. तेरा,
सारा..., वन ही तेरा...
खिल तूं..! क्यूं न यहीं...,
जा.. ना
अब, फिर कहीं...
तुझसे, विनती.. करूं,
हां.. री...
विनती.. करूं!
पंखुरी...! मेरी... प्यारी! पंखुरी...!
मा..न.. मेरी,
कुछ.. तो मान मेरी,
ये..., मां.. है, तेरी...
इसकी, कहां ग ल ती ...
पूछूं...! कहां गलती ?
पंखुरी.....!
रह तूं, अपनी गली..
ये ही हित में, तेरी...
वो.. ना, तेरी 'गली'...,
हां, री तेरी...गली,
पंखुरी... !
मेरी..
'जां', तूं.. पंखुरी!
मेरी 'आन' पंखुरी, मेरी 'मान' पंखुरी।
रुक ना, मान पंखुरी!
क्यों.. तूं, इतनी.... खिली..!
दुख अब तेरी जिंदगी,
दुख अब मेरी जिंदगी!
फिर.. भी,
खुश रह! प्यारी पंखुरी..
मांगू! अब न लगे.. पंखुरी!
पग: दो
सोचता.. हूं
मैं, खड़ा होकर,
अपने चौखट से सटे..
देहरी... के, दीवट.. पर..
आगे बढ़ा हूं, या पीछे..
फिर लौटकर
सोचता हूं!
अब दीवारें पक्की हैं,
उजली, रंग पुती हैं।
फर्श भी पक्का, टाईल लगा है,
टॉयलेट तक, घर में ही बना है,
सामने पहले की गली, से चौड़ा
सड़क सा, रस्ता है,
पानी!
पानी अब दिनभर
टंकी से मिलता है।
धुंआ देखने को नहीं, एलएलपी
पर खाना बनता है,
पर, घर से निकलते ही
सीने तक ऊंची
एक दीवार,
हवा और लोगों की नजर,
रोके, बाउंड्री नाम की खड़ी है,
मैने ही बनाई है खुद,
सभी की तरह,
कुछ के पास तो ये भी नहीं।
इसी ने तो रोक रखा है,
शहर के, गलियों में घूमते
कुत्तों को, जानवरों को
और कुछ ऐसों को
जो मुंह मारते घुस आते है
ताकते रहते है,
ललचाई नजरों से, भौंकते नहीं
सीधे काटने की ताक में रहते है,
उन्हे महकती है,
घर के भीतर छनती चीजे ही नहीं
बच्चियां और औरतें
जो रहतीं हैं प्रायः अकेले इन घरों में।
क्रमशः
जय प्रकाश मिश्र
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