वास्तविक" वह.. 'सत्य..' क्या है।

मित्रों, सत्य को जानना जीवन का सामान्य लक्ष्य होना ही चाहिए। इसी पर कुछ लाइने आप के आनन्दार्थ प्रस्तुत हैं।

पवित्र 

वह, उच्चस्थ... 

जो.. प्रिय! सत्य.. हैं,

अर्थ उनका, "विशिष्ट.. क्या है" ? 

बता, ना..! सच, पूछती... हूँ, स्नेह से...।


"वास्तविक"  वह... 'सत्य..' 

क्या...,

"पारंपरिक" इस.. 'सत्य..' से

कुछ.. अलग है? 

एक, कहता... कुछ नहीं, 

स्थिर यहां...

माया.. है, सब...

सब.... बदलता है, 

क्षण अनुक्षण सतत, प्रियवर...

अनस्तित्व है, कुछ 

है.. नहीं! 

दूसरा..., अस्तित्व को, ले.. ढो रहा है,

पुराणों में, 

वेद में, बाइबिल, इन कुरानो में

धर्म की इन किताबों में

युग.. युगों.. से, 

अनवरत...।

विडंबित है मन मेरा, 

प्रिय! क्या... है, ये.. सब...?

भाव: दो सत्य से सबका सामना होता है एक जीवन का अनुभूत वास्तविक सत्य और दूसरा हम पर जाति, धर्म, स्थान, पुस्तकीय ज्ञान से आरोपित सत्य या परंपरागत माना हुआ, अननुभूत सत्य।

"पवित्रता" है, हर तरह वह..

छोड़, इसको 

सत्य.. 

प्रिय! वह "कुछ नहीं है"शून्य.. है।

विश्वास यह,  "यह.. पवित्र.. है" 

यही तो, 

"उस"  सत्य का,  प्रिय अर्थ है।

भाव: सत्य की मान्यता और महत्ता मन के विश्वास से होती है। फिर भी, जीवन की पवित्रता से अलग सत्य नहीं होगा।

कठिन है, प्रिय! क्लिष्ट है!  

यह समझना! मेरे लिए..

मेटाफर, 

कोई और.. कह, स्पष्ट.. कर दो,

सत्य का प्रिय भाव वह! 

भाव: अन्य उपमा के निरूपण से सत्य को बताएं।

फिर.. 

लो.. सुनो! 

एक महल.. सुंदर! 

कल्पना से बृहत्तर.., प्रिय, मनोहर

सौंदर्य शाली, सुगंधित, अनुपम मनोरम! 

सज्जित प्रिये, हर तरह से, 

हो, खिल रहा, मधु-मय, सु-रसमय..

सच, गुल.. मोहर! 

पर खोलते ही द्वार... 

उसमें: 

फर्श... कोई, ही... नहीं...

शून्य है, तल..! 

यही तो, वह.. सत्य है।

पास तेरे, साथ तेरे, हाथ तेरे 

पर भावना से, विकारों से, विचारों से

चाहना की मानसिक 

अशुद्धियों से

दूर.. है, वह..., सत्य निर्मल। 

भाव: सत्य आंख, कान या मुख का विषय नहीं यह सब जड़ साधन मात्र! निष्पक्ष मन, भाव, विचार हो, जहां कोई लेना देना या अपना मतलब ही नहीं वहां सत्य झांकता है। जैसे सुंदर महल केवल देखने के लिए फर्श विहीन यानी रह नहीं सकते स्वार्थ के लिए नहीं। तब मात्र उसकी निर निसर्ग सुंदरता आप देखेंगे नहीं तो स्वार्थ से आच्छादित दृष्टि होगी।

तुम!  

कौन हो, प्रिय! 

क्या... जानते, हो..? 

मिलते नहीं हो, हाथ.. से, 

दिखते कहां... हो, आंख.. से,

वाक् में क्या! तैरते हो? 

कहां... हो तुम! 

कौन.. हो? 


नहीं.. प्रिय! यह मैं नहीं,

कौन! हूँ, मैं..., कैसे.. कह दूं! 

यही तो, वह प्रश्न है, 

आजतक... 

जो... अनुत्तरित....।

भाव: हम दृग, दृश्य, और विवेक नहीं, परा निसर्ग हैं, आदि सत्य अनादि सत्य, अरूप सत्य! 

जानते तो सभी हैं, बताता कोई नहीं है,

तत् त्वमसि..  सच! 

वह! पवित्रता!  

तो... 

तुम्हीं हो,  प्रिय! सत्य है जो..।

भाव: आप स्वयं ही यह संसार हैं, सत्य हैं, अनुभूति समग्र विश्व की आपमें ही समाहित होती है। आप ही मुक्त भाव में सबकुछ, स्वार्थ में तुच्छ।

इतने दिनों से साथ हो प्रिय! चाहती हूँ 

पूछ लूं, एक बात तुमसे,

बताओ ना! 

क्या..., एक हैं हम..! 

महक बन मेरे साथ रहते, 

मुस्कुराते

भीगे अधर में, 

झांकते! इन, आंख में

आनंद.. झरते, गीत... मेरे

पर क्यों प्रिये! निर्लिप्त.. रहते 

सदा मुझसे, इस तरह से...!


सच नहीं प्रिय, एक हम तुम! 

गरीब हूँ,  मैं.. 

कर्ज है, कुछ, पुराना... 

तुम्हारा प्रिय, मित्र मुझपे, 

बस वहीं तक, साथ हैं हम! 

प्रिय! 

काया हो तुम, और आत्मा मैं...

कुछ दिनों का साथ तुमसे।

बस, कुछ दिनों, व्यापार तुमसे।

तुम अलग! फिर, हम अलग! 

जय प्रकाश मिश्र

मार्ग क्या है

सूखे पेड़ में कीटों की मर्मराहट 

कौन है राही वहां का

दृष्टि जिसकी भृकुटि में हो 

कीट का वह गान क्या है

आसक्तियां, इच्छाएं बचीं हों शेष कुछ कुनमुनाती

भृकुटि का वह ध्यान कैसा

अवशेष है, संवेदना स्मृति कहीं पर

सूखे पेड़ में संगीत कैसा

खून की धारा है बहती हृदय में आवाज उसकी

कौन सुनता है इसे

यह विश्व सारा एक संग

गीत का वह कवि कहां है,

शून्य है, सुनता है जो संगीत वह, फिर दूर जग से।




 






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