आंसू..., भरे ये नयन मेरे, तेरे लिए प्रिय..

 मित्रों, प्रिय विछोह पीड़ ही नहीं देता, विकल कर देता है। अंतस में एक खालीपन छोड़ जाता है जो कचोटता ही नहीं, मन उसे हर रिक्त क्षण में याद करता खोजता है। इसी पर कुछ लाइने आप सभी के लिए। 

सूना..!  है, रे.... 

ये..., सज़र.. तुम बिन! 

कहां... है, तूं.... 

उड़... गई, 

चिड़िया, कोई... हो 

पीं..जरे.... से, अचानक..

देख कर !

यह, दर तेरा 

मुझको... लगा यूं!  किधर.. है तूं! 


यह पिंजरा! 

भी...,

मौन ही, सब बोलता है,

इस तरह! 

देख कर.. हैरान हूँ!

ओ..! नफ़ीसे..., 

दादख्वाहे, हैसियत..!

पूछता.. हूँ, किधर... है, तूं..?


खाली है दर!.. इस कदर...

मासूम..., सब..! 

ऐ....

बन्दा परवर...! 

सजल नयना, इतने... विकल..

पूछते.. हैं, 

हौसला.. ही छोड़कर!

चुप.. चुप.. सभी, एक दूसरे से

सुंदर था तूं, 

अज़बो... गजब! 

दास्तांन था तूं! बाग़बाँ की

खोजता हूँ!  किधर.. है तूं! 


एक गरमी, एक नरमी, 

फ़िज़ां... की, 

इस, 

शान.. था, तूं... 

जान.. था तूं, हम सभी.. की

खोजता बेसब्र हूँ, अब कहां है तूं। 


छोड़ आया हूँ, तुझे...,

यह जानता हूँ,

नाचती, 

कल्लोल.. करती... 

रश्मियों.. में, सुनहली, देदीप्य-मानी 

सौंप आया हूं, उन्हीं की गोद में,

एक दिन ही पहले,

बालकों सा, 

मूढ़ सा, 

किसी मां के शिशु सा 

क्यूं खोजता हूँ तब प्रिये! 

पूछता हूं खुदी से, अरे! कहां है तूं।


सूना..! 

 है...., रे.... 

ये..., सज़र.. तुम बिन! 

कहां... है, तूं.... 

उड़... गई, 

चिड़िया, कोई... हो 

पींजरे.... से, ऐसा लगा तूं।

जय प्रकाश मिश्र 


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