वह, लाल.. सूरज!
मित्रों, समय बलवान है। आईना सबको अपनी तसबीर जीवन में एकबार जरूर दिखाता है। फिर भी लोग हैं, कि मानते नहीं। अपनी दुर्दशा का मानव खुद जिम्मेदार है। इसी पर एक छोटी अभिव्यंजिका आप को प्रस्तुत।
बाग.. थी, एक, जिंदगी... की,
पेड़ मैं... था, लहरता...
चुप.. खड़ा
और..
देखता..!
वह लाल.. सूरज!
शिखर पर था,
दोपहर को
समय... आया!
देखते... ही देखते..
बेदम... हुआ।
उतरता नीचे प्रिये
इन सागरों
में
ढल.ता... हुआ,
डूबता....
उसे... देख कर,!
जिंदगी जब बाढ़ पर है,
उफांन... पर है,
बीच उसके
वक्त का पहिया मुझे, चलते दिखा।
चढ़ता हुआ, प्रिय!
सूरज, वही
जिद पर, अड़ा था,
छू रहा
निज हाथ से
भाल प्रिय, वह... काल का,
कराल.. था।
मैं कहां था! सब, हो, रहा था,
जी रही थी जिंदगी,
प्रिय! उस समय
भी
चांद ऊपर..,
जब,
बादलों में हंस रहा।
सच है ये,
जब रो रही थी,
जिंदगी,
रास्तों पर..भूख से,
बेहाल हो, संताप में
कोई! तो... था,. बेलौस बैठा,
लांज.. में, सब.. देखता,
जानता
घूंट.. से दर... घूंट
बैठा, आदमी...
मदिर, मंथर पी रहा।
लोग हैं,
ये...
सभ्यता है, आज की,
हमने चुनी है,
अपने लिए...
कोई हंसता-हंसता रो.. रहा,
कोई! वास्तव में
रो.. रहा।
बस्ती है, सारी आदमी की
आदमी ही, आदमी को
डंस रहा।
जय प्रकाश मिश्र
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